Friday, May 24, 2013

क्या पानी का निजीकरण सही है ?

देश में आज जिस प्रकार से पानी का निजीकरण किया जा रहा है उससे तो लगता है की अब ‘‘जल ही जीवन है‘‘ जैसे नारा अब सिर्फ किताब के पन्ने में दब कर रह जाएगा। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की ओर से जो बयान कुछ दिन पहले जारी किया गया है वो बेहद ही चैंकाने वाली है। केन्द्र सरकार पानी के निजीकरण करने पर विचार कर रही है। राष्ट्रीय जल नीति बहुत ही जल्द जारी की जाने वाली है। जल संसाधन मंत्रालय के मुताबिक जल नीति का मसौदा कई माह पहले तैयार कर लिया गया है, मगर विरोध के चलते अब तक सरकार कदम आगे नहीं बढ़ा पा रही है। इस बारे में लगातार विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से चर्चा भी हो रही है। इसे देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी के रूप देखा जा रहा है। यहा सवाल खड़ा होता है की पानी हमारा होगा, सप्लाई प्रणाली एवं उपकरण भी हमारे होंगे और उसकी पंपिंग कर देसी या विदेशी कंपनियां देश से भारी भरकम मुनाफा कमाकर अपने खजाने भरेंगी। अगर यह योजना सफल हो जाती है तो इसके बाद देष में विदेशी कंपनियों से 30 साल तक समझौता किया जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी संस्थानों के हाथ में पेयजल आपूर्ति का कार्य पूरी तरह आ गया तो फिर जल शुल्क तीन गुने हो जाएंगे।

हमारे देश में सबसे जयादा मीठे जल का भंडार है मगर अब इस निजीकारण के बाद जिसके पास पैसा नहीं होगा वो अब देष में प्यासे रहेगा। पिछले कई वर्षो से कॉरपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर इस मीठे जल पर लगी हुई है। वे जानते हैं कि इसकी मार्केटिंग में कमाई की अपार संभावना है। उनकी नजर में यह नीला सोना है और आने वाले दिनों में इसका महत्व जमीन के नीचे से निकलने वाले कच्चे तेल से भी ज्यादा होगा। इसलिए 70 के दशक से शुरू हुए इस प्रयास में पहले जल वितरण की टेक्नोलॉजी से कमाई की गई, और अब निजीकरण करके एक बार फिर मुनाफे की रकम वसुलने के लिए सरकार ये प्रयास कर रही है। पानी जीवन के लिए आवश्यक है, पानी को हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है मगर अब वह बाजार का माल होगा। उसे खरीदने और बेचने का मतलब है, जिसके पास खरीदने की ताकत नहीं है, उसका पानी से वंचित होना। क्या किसी सरकार या व्यवस्था को ऐसा करने का अधिकार है? क्या सरकारें हवा और पानी जैसे नैसर्गिक संसाधनों का स्वामित्व किसी को सौंपने का अधिकार रखती हैं? 

क्या ऐसे प्राकृतिक संसाधनों पर हर प्राणी का बुनियादी हक नहीं है? ये तमाम एैसे सवाल है जिसका जवाब सरकार के पास नहीं है। अगर एक गरीब परिवार की आय तीन हजार रुपये मासिक हो तो वह एक हजार या 900 रुपये तक पानी का बिल कहां से भरेगा और फिर बिल देने के बाद उनके पास क्या बचेगा। ये बेहद गंभिर सावाल है जो भारत जैसे देश के लिए सवालिया निषान खड़े कर रहे है। दुनिया में पानी का निजीकरण कोई नई बात नहीं है। सन् 1999 में लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया में पानी का निजीकरण किया गया था। ठेकेदार कंपनी एगुअम डेल तुनारी ने अनुबंध के बाद न सिर्फ तीन गुना दाम बढ़ए बल्कि उसने कुओं और टयूबवेलों पर भी कब्जा कर उन पर मीटर लगा दिए थे। पानी की दर वृध्दि से उत्पन्न जनाक्रोश ने वहां गृहयुध्द की स्थिति निर्मित कर दी थी। 

अब लगता है की हमारे देश में पानी का निजीकरण के बाद इसी प्रकार की स्थिती उत्पन्न होने वाली है। समाज में आज कई एैसे समाजिक कार्यकर्ता है जिनका कहना है की पानी प्रकृति की देन है और उस पर किसी का स्वामित्व नहीं है, मगर सरकार को अपने मुनाफा के आगे ये सारी बातों का कोई तर्क समझ में नहीं आ रही है। पानी व्यक्ति के जीने का आधार है, इसलिए संविधान भी पानी की कीमत वसूलने की इजाजत नहीं देता। संविधान की धारा-21 व्यक्ति को जीने का अधिकार देती है जिसमें ऐसी वस्तु जिससे व्यक्ति का जीवन जा सकता है उसका निजीकरण संविधान का उल्लंघन है, तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पानी का निजीकरण सही है ?

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