Thursday, July 4, 2013

क्या आधुनिक समाज मर्यादाओं को ताक़ पर रख दिया है ?

समाज के कायदे बदल रहे हैं. पहले से बने बनाए सामाजिक नियम सिर्फ आधुनिकता की आंच में ही नहीं जल रहेए बल्कि अब उन पर कानूनी मुहर भी लग रही है. समाज के ये कायदे हालांकि हमने ही बनाए हैं पर कुछ वर्जनाएं टूटते हुए सवाल भी खड़ी कर रही हैं. सामाजिक कायदे.कानूनों के नाम पर किसी का शोषण सही नहीं है पर क्या यूं ही किसी सामाजिक व्यवस्था को आधुनिकता की जरूरत मानते हुए बदल देना सही है. मद्रास हाई कोर्ट ने एक केस का फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर दो वयस्क युवक.युवती अपनी मर्जी से शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाते हैं तो उन्हें शादीशुदा जोड़े की तरह ही माना जाएगा. अगर शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना साबित हो जाता है तो वह जोड़ा बिना तलाक के दूसरी शादी नहीं कर सकता. यह तब और भी ज्यादा लागू होता है अगर इस संबंध में युवती गर्भवती हो जाती है. एक युवक के साथ संबंधों में बिना शादी के दो बच्चों की मां की अपील की सुनवाई पर मद्रास हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया है. इस फैसले पर युवा रोष जाहिर कर रहे हैं. सोशल मीडिया में फैसले के खिलाफ बड़ी संख्या में कमेंट्स देखने को मिल रहे हैं. 

गौरतलब है कि मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय सामाजिक व्यवस्था और विचारधारा में अपनी तरह का एकदम अलग है. पर नया नहीं है अभी कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने भी बड़ी संख्या में युवाओं के बिना शादी लीव इन रिलेशन में रहने को देखते हुए इसे कानूनन पति.पत्नी की तरह माने जाने का फैसला सुनाया था. मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले पर भी बहुत कुछ उसी फैसले की परछाई दिख रही है. पर सवाल यह उठता है कि क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था का यह फैसला सही है.

युवाओं में आधुनिकता को अपनाने के जोश ने लड़के.लड़कियों के संबंधों में आज बहुत बदलाव आया है. पहले सेक्स जैसे मामलों में लड़कों की पहल दिख जाती थी पर लड़कियां हमेशा लाज.शरम के पहरे में रहती थीं. प्रेम संबंध पहले भी थे पर आज की तरह सेक्स का खुलापन तब नहीं था. खासकर पिछले 5 सालों में लड़के.लड़कियों के बीच सेक्स का यह खुलापन बहुत अधिक नजर आने लगा है. आज लड़कियां भी लड़कों के साथ घूमनेए दोस्ती करने यहां तक कि शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने में भी नहीं हिचकतीं आर्थिक सक्षमता ने भी लड़के और लड़की के बीच की कुछ अनकही वर्जनाओं को तोड़ा है. यही कारण है कि आज कम उम्र के लड़के.लड़कियां भी प्रेम संबंधों में पड़ रहे हैं और सेक्स की सीमाएं भी टूट रही हैं. 

लिव इन रिलेशन भी बढ रहे हैं. पर इस संबंध में एक जो नई कमजोर कड़ी सामने आती है, वह है सामाजिक सोच. आज यह जरूर है कि लड़कियां आर्थिक रूप से सक्षम होकर अपनी मर्जी से ऐसी आजाद जिंदगी चुन रही हैं, लड़कों को भी ऐसी लड़कियों का साथ अच्छा लगता है पर बात उस जगह अटकती है जब समाज के सामने ये जोड़े आते हैं, समाज आज भी ऐसे संबंधों को स्वीकार नहीं करता यहां पर लड़कों को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भारतीय समाज में लड़कों को खुलेपन की आजादी है, पर लड़कियों को अपनी इज्जत बचाकर रखने की सलाह दी जाती है. लड़की आधुनिकता की सोच में शादी बिना इन संबंधों में पड़ तो जाती है, पर क्योंकि सामाजिक मान्यता इसे स्वीकार नहीं करती तो कोई भी परेशानी आने पर वह इसे सुलझाने की स्थिति में नहीं होती. 

लड़के भी ऐसे मसलों को सुलझा नहीं पाते. फिर दोनों ही इस संबंध से उबरना चाहते हैं पर लड़कियों की सामाजिक सोच उनके लिए बंधन फिर भी बन जाता है कई बार लड़कियां गर्भवती हो जाती हैं. ऐसे में वे सामाजिक सपोर्ट के लिए शादी करना चाहती हैं, पर तब तक अनचाहे हो चुके इस संबंध से लड़के मुक्त होना चाहते हैं. इसलिए शादी से इनकार करते हैं. हालांकि यह दोनों ही पक्षों का स्वतंत्र फैसला होता है. पर आखिर में लड़कियों के लिए यह पूरी उम्र बोझ की तरह बन जाता है, जबकि लड़के इससे आसानी से निकल सकते हैं. शायद कोर्ट के ये फैसले लड़कियों की इस दशा को देखते हुए ही आए हैं. पर इसका एक पहलू और भी है जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते.

इसमें कोई दो राय नहीं कि युवाओं का लिव इन में रहनाए शादी से पहले सेक्स के मामले बढ़ना परिपक्व युवाओं का अपना फैसला होता है. इतना ही नहीं इसमें दोनों पक्षों की रजामंदी होती है. पर यह भी सच है आज कम उम्र में युवा आर्थिक सक्षमता हासिल कर रहे हैं. लड़के.लड़कियां दोनों में यह अनुपात लगभग समान है. हमारे देश में कानूनन 18 के बाद युवती और 21 के बाद युवा परिपक्व माने गए हैं. इस उम्र के बाद उन्हें माता.पिता से अलग अपने फैसले लेने की आजादी मिल जाती है. पर यह भी एक बड़ा सच है कि इस उम्र में उनमें परिपक्वता कम और हर चीज के प्रति आकर्षण ज्यादा होता है. विपरीत सेक्स के प्रति खासकर यह आकर्षण कुछ ज्यादा ही होता है. पहले क्योंकि 26.28 से पहले युवा आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते थे. पर आज वोकेशनल पढ़ाई उन्हें 20.22 की उम्र में ही स्वच्छंद आर्थिक मजबूती दे देती है

ऐसे में आज पहले की तरह वे मां.बाप की बंदिशें मानने को भी मजबूर नहीं हैं और अपनी मरजी का करते हैं पर आखिरकार वे इन संबंधों को लंबे समय तक चला पाने में अक्षम होते हैं. बात समझ में आती है तो वे मां.बाप की शरण में वापस आते हैं या आपसी सहमति से इसे तोड़ भी देते हैं. लिव इन रिलेशन तो पॉपुलर ही इसीलिए हुआ क्योंकि शादी के बाद किसी संबंध को निभाने की बाध्यता इसमें नहीं थी. युवा इसे खुलकर अपना रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी के साथ पूरी उम्र मजबूरी में नाखुश रहकर साथ रहने से अच्छा है कि कुछ दिनों तक साथ रहकर इसे परख लिया जाए. शादी से सेक्स भी विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण का ही नतीजा होता है. ज्यादातर कपल इसे ढोना नहीं चाहतेए पर कोर्ट के ये फैसले इसे भी ढोने को मजबूर कर रहे हैं जाहिर है न युवाओं के लिएए न शादी जैसी संस्था के लिए यह सही है.

हो सकता है कि कोर्ट ने अपने इस फैसले से आधुनिकता की आड़ में लड़कियों के साथ नाइंसाफी या शोषण को बढ़ने से रोकना चाहा हो. पर शादी जैसी संस्था को किसी 2.4, 10 महीनों के आकर्षण भरे रिलेशनशिप से तुलना करना और यह बाध्यता लाना युवा तो क्याए शायद परिपक्व समाज भी स्वीकार न करे हालांकि हर नियम.कानून के कुछ फायदे.नुकसान होते हैं इसके फायदों के साथ इसके नुकसान पर भी एक बार गहराई से सोचना होगा. हो सकता है यह फैसला ऐसे मामलों में कमी ला दे यह भी हो सकता है कि इसका कोई और ही नकारात्मक पहलू उभरकर सामने आए.

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