Thursday, August 29, 2013

वृंदावन की गलियों में कान्हा की गूंज !

                                                काहे को तूने मेरा माखन चुराया !
                                                काहे को तूने मेरी गगरी गिराई !!

वृंदावन की गलियों में आज भी कन्हैया हर दिल में बसा है। लोगों की दिलों में कान्हा की प्रेमे हमने आखों से देखा है। सुबह से ही सड़को पर भक्तों की हुजूम लग जाती है और पूरा मथुरा- वृंदावन कान्हामय हो उठता है ।  नटखट कान्हा का बाल रूप हर किसी को पसंद है। कन्हैयाए कान्हाए मुरली मनोहर माखनचोर जैसे नामों से सुशोभित कृष्ण का बाल रूप हर किसी के मन को हरने वाला है। जीवन भर अपनी जन्मदात्री माता से अधिक यशोदा माता को मान देने वाले कृष्ण ने दुनिया के सामने यह उदाहरण पेश किया कि कर्म हमेशा ज्यादा उपासक होता है।

जन्माष्टमी पर्व कृष्ण की उपासना का पर्व है। इस अवसर पर हम कृष्ण के बाल रूप की वंदना करते हुए उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। कृष्ण के बाल रूप से लेकर उनका पूरा जीवन कर्म की प्रधानता को ही लक्षित करता है। अपने मामा कंस का वध कर कृष्ण ने यह उदाहरण पेश किया कि रिश्तों से बड़ा कर्तव्य होता है। कर्तव्य परायणता की यही सीख कृष्ण ने रणभूमि में अर्जुन को भी दी जो अपनों के निर्बाध वध से आहत होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो चले थे।
 
गीता आज भी हमारे धर्मग्रंथों में सर्वोत्तम ग्रंथ है जो जीवन के झंझावात में आपके हर सवाल का जवाब देती है। कृष्ण हमारी तमाम अन्य धार्मिक उपासनाओं से इस प्रकार अलग हैं कि कृष्ण के उपदेश आज के व्यावहारिक जीवन के अनुरूप और व्यावहारिक लगते हैं।

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