Tuesday, August 6, 2013

क्या दोस्ती के मायने बदल गए है ?

आज पूरा एशिया महादेश फ्रेंडशिप डे मना रहा है, मगर पीछले कुछ सालों में जिस प्रकार से दोस्ती के रिस्तों में गिरावट आई है, उसको इस रिस्ते पर सवालिया निशान लग गया है। इस लिए आज हम आपके बिच इस विषय को लेकर कर आए है। जिसकी सुरूआत हम इस दोहे के साथ कर रहे है। 

                                                    मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव।
                                                    रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय।।

रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

मगर आज के दौर में दोस्ती के मायने बदल गये है। आज दोस्ती सिर्फ नाफे नुकसान के लिए हो रही है। जब मन किया दोस्त बना लिए और, जब नीजि हीत पूरा हो गया तो तोस्ती तोड़ लिया। इसी लिए रहीम ने कहा है कि,,,,,

                                                  रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
                                                  टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।।

ऐसे तो दोस्ती का इतिहास सदियों पुराना है। मगर उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही दोस्ती के रिश्ते को पर्व के रूप में मनाने की पहल होने लगी थी। सबसे पहले वर्ष 1930 में हॉलमार्क कार्ड के संस्थापक जोएस हॉल ने फ्रेंडशिप को प्रमोट किया। 27 अप्रैल 2011 को जनरल असेम्बली ऑफ यूनाइटेड नेशन्स ने फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया। जिसे भरतीय उपमहाद्वीप में अगस्त महीने के पहले सप्ताह के रविवार को फ्रेंडशिप डे के तौर पर मनाया जाता है।

मगर आज के बदलते दौर में जितनी तेजी से दोस्ती के मायने बदल रहे है उसको लेकर कई अहम सवाल खड़े होने लगे है। ऐसे में ये सवाल उठता है कि दोस्त कहे किसे? और दोस्ती करें किससे। 

जिंदगी की ऐसी कोई राह नहीं है जहां आपको दोस्त ना मिलें मगर क्या इसे दोस्ती का नाम दे दिया जाय फिर इनमे से किसी को दोस्त बना लिया जाय ये भी एक बड़ा सवाल है।  

                                                           जीने का ढंग तूने सिखलाया,
                                                           तू है मेरा हमराज, हमसाया।
                                                           तूने पढ़ लिए सारे राज,
                                                           मैं बना एक खुली किताब।

हमारी जिंदगी में बहुत से ऐसे राज होते हैं जिन्हें हम हर किसी को नहीं बता सकते। ऐसे में हम उन्हें अपने दोस्तों को बताते हैं। एक खुली किताब की तरह हम अपनी जिंदगी के सभी पन्ने उसके सामने खोल देते हैं और वह हमें भटकाव से सही राह की ओर ले जाता है।

कई बार परेशानियों के समय हमारा अपना पीछे हट जाता है तब दोस्त ही होता है जो हमें हिम्मत देकर हमारा साथ निभाता है। ऐसे ही वक्त में हमें अपने-पराए की पहचान होती है। ऐसे में रहीम को एक बार फिर से याद करना होगा। रहीम कहते है,,,

                                                 कही रहिमन संपती सगे, बनता बहुत बहु रीत । 
                                                 बिपती कसौटी जे कसे, तेइ सांचे मीत ।।

जो बिपती में साथ देता है वही सच्चे मित्र है। जो रिश्ता जीवन भर इमानदारी, वफादारी से निभाया गया हो वही सही मायने में मित्रता कहलाता है। आज हम चाहे कितना भी दोस्ती यारी कि बात कर ले मगर कृष्ण और सुदामा के दोस्ती कि मिषाल आज भी लागों के लिए एक प्रेरणा का विषय है।  

जब कृष्ण को सुदामा को आने कि जानकारी मिली तो कृष्ण दौड़ते हुए सुदामा से मिलने पहुंचे और सुदामा को गले लगा लिया। उनकी हालत देखकर कृष्ण रोने लगे और उन्हें अपने महल में ले जाकर उनकी सेवा की। जब कृष्ण को उनकी हालत का अंदेशा हुआ तो उन्होंने अपनी दोस्ती निभाते हुए सुदामा को सुदामा नगरी का राजा बना दिया।

दोस्ती का रिश्ता किसी भी सरहद को नहीं मानता। वह चाहे देशों की सरहद हो, उम्र की सरहद हो या धर्म के नाम पर बनाई गई वो शरहद हो जिसे पार करने से अक्सर लोग डरते हैं। दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जिसमें लोग एक दूसरे के प्रति पूरे ईमानदार होते हैं। मगर आज ये दोस्ती प्यार, मोहब्त, शरारत, धोखा और, मौकापरस्ती में तबदील हो गई है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या दोस्ती के मायने बदल गए है ?

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