Sunday, September 15, 2013

1971 की युद्ध से पहले की कहानी !

13 जून 1971 को ब्रिटेन के अखबार द संडे टाइम्स में एक खबर छपी. जिसके मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज का जुल्म बढ़ गया था. इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के सामने पू्र्वी पाकिस्तान के हालात को बयां किया और बताया कि किस तरह पूर्वी पाकिस्तान के अंदर फौज आम लोगों का कत्लेआम कर रही है.

ये उन दिनों की बात है जब भारत के पूरब और पश्चिम दोनों में ही पाकिस्तान था. पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला बोलने वाले लोग थे जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में उर्दू जुबान बोली जाती थी. पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान में दो हजार किलोमीटर का फासला था. लेकिन ये एक ही मुल्क के दो हिस्से थे. फौज, और सरकारी नौकरियों में पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का दबदबा था.  जिसके चलते पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने बगावत कर दी. इस बगावत को दबाने के लिये पाकिस्तान की सेना ने मोर्चा संभाला.

25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने अपने ही मुल्क के बंगाली भाषी लोगों पर जुल्म ढाहना शुरू किया. इस कार्रवाई को पाकिस्तानी सेना ने आपरेशन सर्च लाइट का नाम दिया. बांग्लादेश की सरकार के आंकड़ो के मुताबिक पाकिस्तानी सेना के दमन में मारे जाने वालों की तादाद 30 लाख थी.

25 अप्रैल 1971 को इंदिरा ने एक कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और थल सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को भी बुलाया बैठक में आने के लिए कहा. कैबिनेट की मीटिंग की शुरुआत में इंदिरा गांधी ने खुद पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के मुख्य मंत्रियों की चिट्टियां पढ़ी और फिर मानेकशॉ की तरफ मुड़ कर कहा कि मैं चाहती हूं इस समस्या से निपटने के लिए कुछ किया जाए. मैं चाहती हूं कि पूर्वी पाकिस्तान में सेना भेजी जाए...

युद्ध से मानेकशॉ का कतराना

जनरल सैम मानेकशॉ ने कई वजह गिनाते हुए कहा कि अभी हम युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है. 25 अप्रैल की इस मीटिंग में फिलहाल ये तय हो गया था कि पूर्वी पाकिस्तान में जो हो रहा था उसको लेकर भारत चुप नहीं बैठेगा. युद्ध की तैयारी के खुले आदेश भारत की सेना को मिल गए थे. दूसरी तरफ 7 मार्च 1971  को पूर्वी पाकिस्तान के ढाका शहर में बंगबंधु मुजीबुर्रहमान ने जोरदार भाषण दिया. और पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारी शासन के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन शुरु हो चुका था.

शेख मुजीबुर्रहमान पाकिस्तान के बांग्लाभाषी लोगों का नेतृत्व कर रहे थे. पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ शेख मुजीब का विरोध पहले से ही था. जब 1956 में यह फैसला हुआ था कि पूर्वी बंगाल को अब पूर्वी पाकिस्तान कहा जाएगा. मुजीब ने इसे बंगाली संस्कृति और पहचान के लिए खतरा बताया. शेख मुजीबर्रहमान को पूर्वी पाकिस्तान में बंगबंधु कहा जाता था. उन्हें इतना जबरदस्त समर्थन हासिल था कि दिसबंर 1970 के आम चुनाव में दो सीटों को छोड़कर पूर्वी पाकिस्तान की सभी सीटों पर मुजीब की पार्टी आवामी लीग की जीत हुई. इस जबरदस्त जीत के बाद पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में भी उनकी पार्टी को बहुमत हासिल हो गया.

बंगबंधु का विरोध

बंगबंधु मुजीबुर्ररहमान को मिली जबरदस्त जीत और उनके लोकतांत्रिक आंदोलन से पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहया खान और आम चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो, दोनो ही घबराए हुए थे. शेख मुजीबुर्रहमान ने चुनाव के नतीजों के आधार पर सरकार बनाने की पेशकश की.. लेकिन याह्या खां और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की जोड़ी ने आवामी लीग को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया. इस रवैये से नाराज मुजीबुर्ररहमान ने 7 मार्च 1971 को पश्चिमी पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ बिगूल फूंक दिया. मुजीब समर्थक सड़कों पर उतर आए. आंदोलन की अगुवाई कर रहे मुजीबुर्ररहमान को गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तानी की जेल में भेज दिया गया.

जीनोसाइड यानी नरसंहार. पूर्वी पाकिस्तान में उन दिनों यही हो रहा था. पश्चिमी पाकिस्तान की सेना के जुल्मों से बचने के लिए हजारों की संख्या में शरणार्थी रोज भारत के पूर्वी राज्यों में आ रहे थे. पूर्वी पाकिस्तान के हालात से पैदा हुई स्थिति से इंदिरा के सामने दोहरी चुनौती आ ख़ड़ी हुई. एक थी शरणार्थियों की वजह से पूर्वी राज्यों में किसी भी तरह के सांप्रदायिक तनाव को रोकना और दूसरी इन शरणार्थियों के रहने और खाने की व्यवस्था करना.

भारत में शरणार्थियों के लिए राहत शिविर लगाए गए थे. मई 1971 में इंदिरा ने खुद शरणार्थियों के लिए बने राहत शिविरों का दौरा किया और कहा कि उनकी मदद के लिए जो कुछ हो सकता है किया जाएगा. इतना ही नहीं, 24 मई 1971 को इंदिरा ने लोकसभा में यह बयान देकर दुनिया के सामने भी भारत का रुख साफ कर दिया कि “आज जिसे पाकिस्तान की आंतरिक समस्या कहा जाता है वह भारत की भी आंतरिक समस्या बन गई है. इसीलिए हम पाकिस्तान को यह कहने के हकदार हैं कि वह आंतरिक मामलों के नाम पर जो कार्रवाइयां कर रहा है उसे तत्काल बंद करे."

इंदिरा ने इस बात पर जोर दिया कि अब यह पाकिस्तान का अंदरूनी मामला न रहकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है इसलिए बड़े देशों को मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना होगा. अमेरिका उन दिनों चीन के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाने में लगा हुआ था. इसके लिए उसे पाकिस्तान की जरूरत थी. इंदिरा ने इसके जवाब में ऐसा पासा फेंका जिसकी अमेरिका ने कल्पना भी नहीं की थी.  9 अगस्त 1971 को भारत और सोवियत संघ ने एक ऐसा समझौता किया जिसके तहत दोनो देश एक दूसरे की सुरक्षा का भरोसा अपने उपर ले लिया.

इधर पूर्वी पाकिस्तान के हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. वहां पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्स, ईस्ट बंगाल रेजिमेंट और ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स के बंगाली सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज के खिलाफ बगावत कर खुद को आजाद घोषित कर दिया था. और सभी मुक्ति वाहिनी में शामिल हो गये . अब लड़ाई मुक्तिवाहिनी और पाकिस्तानी फौज के बीच हो रही थी. मार्च से सितंबर तक भारत में करीब 1 करोड़ शरणार्थी आ चुके थे. इसकी वजह से भारतीय खजाने पर करीब 300 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा था. कई देशों ने भारत की आर्थिक मदद का भरोसा दिया लेकिन पाकिस्तान पर लगाम लगाने के मूल मुद्दे पर सब खामोश थे.

इंदिरा का सब्र का बांध टूटा

इंदिरा के सब्र का बांध अब टूट चुका था. उधर पाकिस्तान अमेरिका और चीन के दम पर रह रह कर युद्ध के लिए ललकारने की कोशिश कर रहा था. नवंबर के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान के विमानों ने बार बार भारतीय वायु सीमा का उल्लंघन शुरू कर दिया. इस पर भारत की तरफ से पाकिस्तान को चेतावनी दी गयी लेकिन बजाय संभलने के पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहिया खान ने 10 दिन के अंदर युद्ध की धमकी दे डाली. इसी बीच पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति सेना एक के बाद कई पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करती जा रही थी. ऐसे में पाकिस्तान ने अपनी रणनीति बदली और भारत की पश्चिमी सीमा पर गोलीबारी तेज कर दी.

आखिरकार भारतीय सेना ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू करनी पड़ी. 3 दिसंबर 1971 को इंदिरा एक दौरे पर पश्चिम बंगाल में थी. जब उन्हें खबर दी गयी कि पाकिस्तान ने भारत की पश्चिमी सीमा हर हवाई हमला कर दिया है. इंदिरा तुरंत दिल्ली लौट आयी और दिल्ली पहुंचते ही इंदिरा सीधे मैप रूम पहुंची, जहां उन्हें हालात के बारे में बताया गया.

आधी रात हो चुकी थी जब इंदिरा ने ऑल इंडिया रेडियो के जरिए पूरे देश को संबोधित किया. और कहा - कुछ ही घंटों पहले पाकिस्तानी हवाई जहाजों ने हमारे अमृतसर, पठानकोट, फरीदकोट श्रीनगर, हलवारा, अम्बाला, आगरा, उत्तरलाई, जोधपुर, जामनगर, सिरसा और सरवाला के हवाई अड्डों पर बमबारी की. आप सबको मालूम है कि हम इस कोशिश में थे कि बांग्लादेश का मसला शांति से निपटे. स्थिति बिगड़ती गयी, मुक्तिवाहिनी ने उन आदर्शों की लड़ाई लड़ी, जो हम लड़ते रहे हैं. अब बांग्लादेश पर जो लड़ाई थी वो भारत पर भी आ गयी है, मुझे संदेह नही है कि विजय भारत की जनता की और भारत की बहादुर सेना की होगी.

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