Sunday, September 29, 2013

अमेरिका के सामने मनमोहन सिंह शरणागत क्यों है ?

भारत और अमेरिका के बीच हुआ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता एक बार फिर से सुर्खियों में है। ये परमाणु करार परमाणु दायित्व कानून के कारण अवरुद्ध हो गया था। मगर आज एक बार फिर से ये जिन्न बाहर निकला है। भारतीय परमाणु विद्युत निगम लिमिटेड और वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी ने प्रारंभिक व्यावसायिक करार पर हस्ताक्षर किए हैं। इस करार के बाद सवाल खड़ा होता है कि जिसे अमेरिका खुद नहीं करना चाहता है उसे वह भारत पर क्यों थोपना चाहता है। साथ ही हमारे प्रधानमंत्री खुद को अमेरिका के आगे अपने आप को क्यों षरणागत हो रहे है। परमाणु दायित्व कानून हमेशा से ही बिवादों  में रहा है। इसके अंदर जो प्रावधन किए गए है उसमे कई ऐसी खामियां है जहां पर जवाबदेही नगण्य है। अगर कभी भी कोई दुघर्टना होती है तो देष को एक बार फिर से भोपाल गैस कांड से भी बड़ा त्रासदी झेलना पड़ा सकता है। 

अनुच्छेद 17 के मुताबिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए मशीनें, ईंधन अथवा तकनीक की आपूर्ति्त करने वाले ’सप्लायर’ द्वारा दिये जाने वाले मुआवजे का तभी प्रावधान है, जब ’ऑपरेटर’ और ’सप्लायर’ के बीच उस खास संयंत्र को लेकर हुए इकरारनामे में इस बात का जिक्र हो। जाहिर है, ऐसे में सभी विदेशी ’सप्लायर’ इस बिल की जद से बाहर हैं और ’ऑपरेटर’ से अपने अनुबंधों में वे मुआवजे से मुक्त रहना पसंद करेंगे। साथ ही, ’सप्लायर’ की मुआवजा राशि ’ऑपरेटर’ से कम ही होगी। इस प्रकार, विदेशी या देशी ’सप्लायर’ उस 500 करोड़ रुपये के प्रति भी जवाबदेह नहीं हैं, जिस पर पूरी बहस चल रही है।

नियमों कि अनदेखी कर अमेरिका के दबाव में किए जा रहे ये करार भोपाल गैस कांड से कई गुना बड़े विध्वंसों को न्यौता दे सकता है। सिर्फ अमेरिकी कंपनियों को नहीं बल्कि हाल में भारत से परमाणु समझौता करने वाली फ्रांसीसी, कनैडियन और रूसी कंपनियों और देषी औद्योगिक घरानों को भी इस बिल में संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी करने की पूरी छूट है और दुर्घटना की स्थिति में यह गारंटी है कि मुआवजा कंपनियां नहीं बल्कि सरकार के पैसे से दिया जाएगा, यानी कि खुद जनता का पैसा से जनता को मुआवजा और विदेशी कंपनियों कि बल्ले बल्ले। 

परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन का अकेला ऐसा तरीका है जिसमें विकिरण के जरिए व्यापक स्तर पर विनाश पैदा करने की क्षमता होती है। इसका घातक असर लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है। दिल्ली के एक कबाड़ बाजार में हुए कोबाल्ट-60 विकिरण हादसे से यह बात उजागर भी हो चुकी है कि इससे होने वाले हादसा कितना घातक है। 1986 में युक्रेन में हुए चेर्नोबिल हादसे को याद कर पूरी दुनिया सहम जाती है। जहां परमाणु संयंत्र में हुए रेडियोएक्टिव रिसाव में 65,000 लोग विकिरणजनित कैंसर की भेंट चढ़ गए थे और 350 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में कहा था एक बार कोई गतिविधि, जिससे जोखिम जुड़ा हो, शुरू होने के बाद इसे शुरू करने वाला व्यक्ति ही इसके अच्छे या बुरे के लिए जिम्मेदार होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने जरूरी उपाय कर रखे थे या नहीं। मगर आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को न तो इस देश कि सर्वोच अदालत कि चींता है और न ही उनके सरकार द्वारा बनाए गए परमाणु दायित्व कानून कि। अमेरिका जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा देश हुआ करता था उसने अपने यहां 1973 के बाद से एक भी नए संयंत्र की इजाजत नहीं दी है। मगर आज मनमोहन सिह खुद अमेरिका के दबाव में भारत के उपर ये बिनाशकारी करार थोप रहे है। तो सवाल खड़ा होता है कि अमेरिका के सामने मनमोहन सिंह शरणागत क्यों है ?

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