Tuesday, October 22, 2013

क्या पूरी होगी तीसरे मोर्चे की अधूरी सपना ?

भारतीय राजनीति में अगर तीसरे मोर्चे का राजनीतिक इतिहास खंगाले तो जो बात सामने उभरकर आती है वह यह कि भारत में भाजपा का राष्ट्रीय पटल पर उभार और तीसरे मोर्चे की पुकार दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. लेकिन भारतीय राजनीति उस पड़ाव से भी गुजरी है जिसमें भाजपा ने इस मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया है. तीसरे मोर्चे के गठन की बांग एक बार फिर लगाई जा चुकी है और इस बार मोर्चे के निशाने पर अकेले भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेस भी है. लेकिन तीसरे मोर्चे के लिए खुद तीसरी दुनिया के ये दल कितने तैयार हैं? क्या गैर भाजपा और गैर कांग्रेसवाद उनकी आपसी गैर बराबरी को खत्म कर देगा? दशकों से जारी तीसरे मोर्चे की अधूरी प्रेम कहानी कब पूरी होगी? कभी पूरी होगी भी या नहीं?

भारत के संसदीय इतिहास में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत राज्यों में पहले ही हो चुकी है. मसलन 1967-71 में युनाइटेड फ्रंट के तहत बंगाल में दो बार सरकारे बन चुकी है लेकिन जब राष्ट्रीय राजनीति की चर्चा होती है तो तीसरे मोर्चे का सबसे अहम केन्द्रबिदुं 1989-90 की संसदीय राजनीति है जब राष्ट्रीय मोर्चा के तहत देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी. इस राष्ट्रीय मोर्चा के संयोजक तात्कालीक प्रधानमंत्री वी.पी सिंह थे..राष्ट्रीय मोर्चा के अध्यक्ष एन.टी रामाराव थे. राष्ट्रीय मोर्चा के इस गठबंधन में जनता पार्टी, डीएमके -तमिलनाडू, तेलगू देशम पार्टी -आन्ध्र प्रदेश के साथ-साथ असम गण परिषद और इंडियन कांग्रेस(सोशलिस्ट) में शामिल थी. वहीं भाजपा सहित लेफ्ट फ्रंट ने इस सरकार को बाहर से समर्थन दिया था. 

 पी.उपेन्द्र इस नेशनल फ्रंट के महासचिव थे. हालांकि 1991 में झारखंड मुक्ति मोर्चा भी गठबंधन में शामिल हुआ फिर भी गठबंधन की कहानी अधूरी रह गई. ये तो महज एक पहला एपीसोड है जबकि वर्ष 1996 में तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े रणनीतिकार और पैरोकार रहे माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत थे जिन्होंने देश में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के लिए और सांप्रदायिकता की प्रतीक भाजपा को रोकने के लिए तीसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन की तलाश किया था. नरसिहराव के बाद के डगमगाती कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने की नाकाम कोशिश रही  लेकिन सुरजीत को उन दिनों 1990 में अयोध्या में गोली चलवा चुके मुलायम सिंह यादव से धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की सबसे ज्यादा उम्मीद थी.

लिहाजा उन्होंने अपने करीबी रहे सैफुद्दीन चौधरी के सुझाव को गुस्ताखी माना और 1996 में लोकसभा चुनाव का टिकट उन्हें नहीं दिया लेकिन सुरजीत मुलायम को भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाने में नाकाम रहे क्योंकि तब तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े दल जनता दल को मुलायम की पांच साल पुरानी दगाबाजी याद थी मुलायम ने 1991 में जनता पार्टी से अलग होकर अपनी अलग समाजवादी पार्टी बनाकर ठेंगा दिखा दिया था जिसका दर्द जनता पार्टी को सता रहा था. गठबंधन के इस मुहब्बत में दागाबाजी का दौर शुरु हो चुका था. इतिहास रोचक होता है..लेकिन उससे राजनीतिक दलों को सीख लेने की जरुरत थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फिर सवाल उठना लाजमी है कि जिस प्रकार वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर तीसरे मोर्चे को लेकर उथल-पूथल मचा है. क्या कोई नई जमीन तलाशने की कवायद शुरु हो चुकी है. ये भी सच है कि मुख्यधारा की मीडिया किसी भी प्रकार की थ्रर्ड फ्रंट को नकार रहा है.

 इसमें मीडिया के अपनी आर्थिक हित छुपे हुए हैं. जिसका विस्तार से विश्लेषण यहां पर नहीं किया जा सकता है खैर किसी भी संभवनाओं के अटकलों पर कयास लगाने से पहले एकबार फिर हमें 1996 के दिलचस्प लोकसभा चुनाव का अवलोकन करना पड़ेगा. उल्लेखनीय है कि 1996 लोकसभा चुनाव से पहले ही समाजवादी पार्टी की गठन ने गठबंधन को और बौना कर दिया था. चुनाव से पहले ही गठबंधन की नैया डगमगाने लगी. दक्षिण भारत से सबसे अहम सदस्य डीएमके और एआईडीएमके ने एक दूसरे का बहिष्कार किया. 1995 में टीडीपी ने भी एन.टी.रामाराव के अल्पसंख्यकों के साथ पक्षपात का आरोप मढ़कर अलग हो गई. 

राजनीति के इस रंग में अल्पसंख्यक चन्द्रबाबू नायडू के साथ खड़े होने लगे लेकिन गठबंधन के अध्यक्ष एन.टी रमाराव के हार्ट अटैक हो जाने के बाद जनता दल उनकी विधवा लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़ा होने में संकोच नहीं किया जबकि दुसरी तरफ वामदलों ने चन्द्रबाबू नायडू के साथ मिलकर नया जमीन तलाशने कोशिश की. 1996 के लोकसभा चुनाव में खंडित जनादेश मिलने से राजनीतिक संकट तो थी फिर भी 161 सींटो वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रण भेजा गया. हालांकि अटल बिहारी सरकार 13 दिनों में चल बसी. वाजपेयी सरकार आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सकी. एक बार फिर तीसरे मोर्चे (युनाईटेड फ्रंट) का धागा बांधने की कोशिश शुरु हो गई. 

140 सीटों वाली कांग्रेस पार्टी सीताराम केसरी के नेतृत्व में बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हुई क्योंकि वामदलों के साथ कांग्रेस सरकार बनाने से मना कर दिया. फिर तीसरे मोर्चे की अधूरी प्रेम कहानी की रुपरेखा तैयार की गई. उल्लेखनीय है कि तीसरे मोर्चे की सबसे रोमाचंक एपीसोड 1996 लोकसभा का चुनाव जिसमें 13 पार्टियों ने मिलकर युनाईटेड फ्रंट के तहत अपने प्रेम का इजहार तो किया था..लेकिन इस मुहब्बत में ऐसा क्या था कि वी.पी सिंह के साथ-साथ ज्योति बसू प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था..मार्क्सवादी विचारधारा का आपसी कलह उसी समय उभर कर सबके सामने आया..था...क्या इसे महज मार्क्सवादियों के लिए काला अध्याय ही मान लिया जाए लेकिन इतना तो तय है ये वही समय था भारत में मार्क्सवादी देश के प्रधानमंत्री बनकर पूरी दुनिया को नया संदेश दे सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 

बहरहाल युनाईटेड फ्रंट के एच. डी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने लेकिन बाद में कांग्रेस देव गौड़ा से असंतुष्ठी की बात कहकर समर्थन वापस लेने की रट लगाने लगी..जिसके बाद आई.के गुजराल प्रधानमंत्री बनाना पड़ा था..चन्द्रबाबू नायडू इस युनाईटेड फ्रंट के संयोजक थे. लेकिन एक बार फिर गठबंधन आपसी कलह का भेंट चढ़ गया....राजनीति की जमीनी विसात पर कांग्रेस ने गठबंधन को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई.

गौरतलब है कि पिछले सभी घटनाओं को ताजा करते हुए कई अहम पल याद आ जाते हैं जिससे वर्तमान में तीसरे मोर्चे की रट को बल मिलता है..जिससे मीडिया सामने लाने की कोशिश नहीं कर रही है. इसे मीडिया की आर्थिक मजबूरी कहे या फिर जनता को अंधेरे में रखने की एक घिनौनी साजिश..बहरहाल यहां पर ये भी देखना होगा कि क्या तीसरे मोर्चे के सभी खिलाड़ी एक साथ आने के लिए तैयार हैं. इस प्रकार तमाम ऐसे सवाल हैं जिसका जबाब ढ़ुढ़ना मुश्किल मालुम होता है. तीसरे मोर्चे को माहिर कभी पहलवान रहे मुलायम सिंह सभी को शुरु से ही पटकनिया देने में लगे है. उन्होंने हमेशा विश्वासघात किया है. माकपा सहित सभी वामपंथी दलों ने मुलायम को धर्मनिरपेक्षता की धूरी माना..लेकिन मुलायम हमेशा धूरी को डगमगाते रहे..मसलन युपीए पार्ट-1 में वामपंथी दलों को विश्वास था कि परमाणु समझौते के खिलाफ मुलायम उनका साथ देंगे लेकिन उल्टे मुलायम ने कांग्रेस की युपीए सरकार की डुबती हुई नैया को बचा लिया. दूसरी तरफ युपीए पार्ट-2 में मुलायम ने अप्रत्यक्षरुप से संसद का बायकट किया है. 

वोटिंग में उनका साथ नहीं दिया. लेफ्ट फ्रंट को एक बार जोर का झटका धीरे से लगा. .कुल मिलाकर कहें, तो ऐसे कई मौके आए हैं, जब मुलायम ने उन्हीं दलों को ठेंगा दिखाया, जिन दलों ने उनमें तीसरा मोर्चा के हीरो की तस्वीर देखी थी. दूसरी तऱफ नीतीश कुमार मन ही मन प्रधानमंत्री पद के लिए चवन्नी मुस्कान लेते रहते हैं..दरअसल उनका राजनीति दांव 2014 लोकसभा चुनाव के बाद चलने के कयास लगाए जा रहे हैं. लेकिन इन सभी संभवनाओं पर पानी तब फिर गया..जब वे अपने को घोषित सेकूलर जमात में शामिल होकर कांग्रेस से नजदीकीयां बढ़ाने में लग गए. वही उनके धूर विरोधी लालू से कांग्रेस किनारा करने में जुट गई हैं. बिहार में ब्रहामणवादी राजनीति की चंगुल से उबारने वाले लालू चारा घोटाला मामलें में रांची के सेंट्रल जेल में बंद है. यानि तीसरे मोर्चे की हवा देने वालों का लागातार विकेट गिरता जा रहा है..हलांकि लालू ने किसी भी मोर्चे को नकारा था..लेकिन लालू की राजनीतिक महत्वकांक्षा किसी से छुपी हुई नहीं हैं.

इधर दक्षिण भारत की सियासत में तेलंगाना को लेकर तुफान थमा नहीं हैं. तीसरे मोर्चे के बड़े दल के रूप में तेलुगू देशम पार्टी की भी पहचान रही है. 2004 से आंध्र की सत्ता से दूर चंद्रबाबू नायडू को लगता है कि भाजपा का साथ ही उनकी वापसी करा सकता है लिहाजा वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. ऐआईडीएमके की प्रमुख जयललिता नमो-नमो की भजन-कीर्तन में जूट गई है..वहीं वाम दलों के प्रमुख घटक दल सीपीआई के डी राजा, जयललिता के कोटे से राज्यसभा में पहुंचे हैं. अब चुनाव भी दस सीटों पर साथ-साथ लड़ना चाहते हैं जबकि जयललिता को नमो-नमो का जाप करने फूर्सत नहीं है. मामला गोलमाल है. यानि वामपंथ किस बिमारी से ग्रसित है इसका अंदाजा खुद उसको भी नहीं है. लिहाजा तीसरे मोर्चे की संभवानाओं पर सवाल उठना लाजमी है.

 वर्ष 1996 में तीसरे मोर्चे के प्रमुख दल के तौर पर द्रमुक और अकाली दल की भी भूमिका थी, लेकिन द्रमुक अभी कांग्रेस के खोल से बाहर निकलता नजर नहीं आ रहा और अकाली दल को भाजपा से कोई परहेज नहीं है. इस पूरे खेल में ममता बनर्जी को नजरअंदाज करना नुकसान दायक साबित हो सकता है. लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ममता वामदलों के साथ जाने के लिए कभी तैयार होगी? हालांकि कोलकता में सपा की बैठक में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम की इच्छा ममता के साथ जाहिर की थी. 30 अक्टूबर को होनेवाली बैठक में ममता को मनाने की लगातार कोशिश जारी है. इधर विशेष राज्य के दर्जे के लिए नवीन पटनाइक युपीए में शामिल होते हुए भी दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ पहले ही गरजते हुए जंग छेड़ चुके हैं. मायावती की महत्वकांक्षा किसी से कम नहीं है लेकिन सत्ता से दूर मायावती फिलहाल भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी बार-बार कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात कर रही है. दूसरी तरफ 2004 में 64 सींटों पर कब्जा करने वाली वाम मोर्चा 2009 के लोकसभा चुनाव में 24 सीटों पर आकर सिमट गया है. लेकिन उनके अंदर अभी भी जोश उबल रहा है भले ही अपने प्रभावक्षेत्र वाले राज्यों में वाम मोर्चा सिमटकर बौना हो गया है.


लिहाजा तीसरा मोर्चा कैसे बनेगा, इस सवाल का जवाब शायद 30 अक्टूबर को होने वाली बैठक में निकालने की नाकाम कोशिश ही की जाएगी क्योंकि अब तक बने तीसरे मोर्चे का कोई स्प्ष्ट विजन नहीं रहा रहा है. लिहाजा आपसी फायदे-नुकसान के लिए गठबंधन की नींव रखी जाने लगी जिसमें सभी घटक दलों का आपसी हित की टकराहट होना स्वभाविक है. इसलिए अब तक दो बार तीसरे मोर्चे का गठन तो हुआ लेकिन किसी ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. बहरहाल 30 अक्टूबर को होने वाली वामदलों का मुलायम के साथ बैठक में तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री पद पर एक राय बनाने में एड़ी–चोटी एक करना पड़ेगा. फिलहाल बैठक से जुड़ी किसी भी बात पर महज अटकलों का आकलन किया जा सकता है. लेकिन वास्तविकता तो बैठक के बाद ही उभर कर सामने आ सकता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि तीसरे मोर्चे की थोड़ी भी संभवना बनती है तो सबसे बड़ा सवाल होगा कि उस मोर्चे की स्क्रीप्ट कौन लिखेगा? कहीं गठबंधन की प्रेम कहानी एक बार फिर अधूरी तो नहीं रह जाएगी.

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