Wednesday, October 16, 2013

क्या राहुल गांधी का विकल्प बनेगी प्रियंका ?

सिर्फ 40 मिनट के भीतर प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर लाने के ऐलान की खबर आती भी है और उस खबर की मौत भी हो जाती है। लेकिन इन चालीस मिनट में ही गांधी परिवार की एक्स-रे रिपोर्ट सामने आ जाती है। पहला सवाल प्रियंका को लेकर खड़ा होता है कि क्या वाकई कांग्रेस के लिये प्रियका तुरुप का पत्ता है, जिसके सामने राहुल गांधी की लोकप्रियता कोई मायने नहीं रखती है? दूसरा सवाल राहुल गांधी को ही लेकर खड़ा होता है कि क्या राहुल गांधी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को ठिकाने लगाने का स्थिति में नहीं हैं? और संगठन को मथ कर जिस तरह कांग्रेस को युवा हाथों में सौपने का सपना राहुल गांधी ने देखा है, वह महज सपना है। तीसरा सवाल सोनिया गांधी को लेकर खड़ा होता है कि क्या सोनिया गांधी उम्र, स्वास्थ्य और सियासी वजहों से अब रिटायर होने के रास्ते पर है?

जाहिर है प्रियंका गांधी को लेकर तीनों सवाल गांधी परिवार के ही अंतर्विरोध को लेकर उछले और राजनीतिक धमाचौकडी के उस दौर में उछले जब गांधी परिवार बिना जिम्मेदारी सत्ता में है। और गांधी परिवार का कोई एक शख्स नहीं तीन तीन शख्स सियासत कर रहे हैं। तो क्या ऐसे वक्त में प्रियका गांधी को लेकर कांग्रेस ने जानबूझकर खबर उछाली है कि प्रियका अब रायबरेली-अमेठी से बाहर निकलेंगी और नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार का जवाब देंगी।

असल में गांधी परिवार पहली बार सियासत में रहकर भी जिस तर्ज पर देश को चलाने का भ्रम बनाये हुये है, वह आजादी के बाद अपनी तरह का अजूबा ही है। क्योंकि इससे पहले सिर्फ नेहरु की मौत के बाद ही इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष होकर भी पीएम नहीं बनी और तब कांग्रेस सिंडिकेट यानी कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री को पीएम बनाया। लेकिन 1966 में शास्त्री जी की मौत के बाद कहीं कामराज या कहें वही सिंडिकेट इंदिरा गांधी के पत्र में झुका और मोरारजी देसाई वरिष्ठ होकर भी और चाह कर भी पीएम ना बन सके। और एक वक्त के बाद उन्हें कांग्रेस के बाहर का रास्ता देखना ही पड़ा। कांग्रेस के पन्नों को पलटें तो वही कामराज को भी इंदिरा ने अलग थलग किया या कहें कांग्रेस दो फाड़ हो गई जब सिंडिकेट काग्रेस का विरोध इंदिरा गांधी ने किया और कामराज ने इंदिरा गांधी का विरोध किया। अगर इस कडी को आगे बढायें तो

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के तत्काल बाद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने राजीव गांधी को तुरंत पीएम बनाये जाने का विरोध किया था। और इसका खामियाजा उन्हें सबसे बड़ी जीत के साथ पीएम बने राजीव गांधी को मंत्रिमंडल में जगह मिलना तो दूर, कांग्रेस छोड़ राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाकर अपने राजनीतिक आस्तित्व को बचाने तक की आ गई थी। दरअसल गांधी-नेहरु परिवार पर कोई टिप्पणी तो दूर कई मौको पर तो समूची कांग्रेस ही खामोश रही है और जब भी कोई बोला है तो उसे रास्ता अलग पकड़ना पडा है। इंदिरा गांधी के दौर तो इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया के नारे तक लगे। लेकिन अब के दौर में यानी सोनिया गांधी के वक्त पहली बार हालात ऐसे भी हैं, जहां नेहरु परिवार की चौथी पीढी ना सिर्फ जवान हो चुकी है बल्कि भागते वक्त के साथ उम्र भी गुजर रही है। और देरी का मतलब है कांग्रेस की विरासत संभालने से भागना या कांग्रेस का मतलब जहां गांधी-नेहरु परिवार ही माना जाता है, उससे चूक जाना। लेकिन इसी दौर में कांग्रेस की हालत क्या है, यह प्रियका गांधी की खबर के सामने आने से लेकर खबर के खंडन या खारिज किये जाने के चालिस मिनट के वक्त में ही दिख गया। 

नरेन्द्र मोदी के गुजरात के संबरकांठा से चुन कर आने वाले काग्रेसी सांसद मधुसुधन मिस्त्री ने दिल्ली में पत्रकारों को जानकारी दी कि प्रियंका गांधी चुनाव प्रचार के लिये रायबरेली-अमेठी से बाहर निकलेगी। और इसके तुरंत बाद ही कांग्रेसियों में होड़ मच गयी कि कौन प्रियंका गांधी के पक्ष में कितना बोल सकता है। राशिद अल्वी और कपिल सिब्बल सरीखे नेता यह कहने से नहीं चूके कि कांग्रेस का तो हर कार्यकर्ता चाहता है कि प्रियंका गांधी मुख्यधारा की राजनीति में आयें।

लेकिन कांग्रेस की त्रासदी देखिये जैसे ही प्रियंका के चुनाव प्रचार में कूदने की खबर का खंडन काग्रेस के प्रवक्ता अजय माकन ने किया वैसे ही झटके में हर कांग्रेसी को लगने लगा कि प्रियंका गांधी को अभी राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर नहीं आना चाहिये। और एक एक कर वही कांग्रेसी बदलने लगे जो आधे घंटे पहले तक प्रियंका के पक्ष में थे। सवाल है कि क्या मौजूदा दौर में कांग्रेस इतनी कमजोर हो गयी है कि गांधी परिवार के दो सदस्यों के आसरे भी उसे अपनी सत्ता जाती दिख रही है। या फिर जो प्रियंका अभी तक रायबरेली और अमेठी से बाहर चुनाव प्रचार तक के लिये निकली है उनमें कोई नये गुण कांग्रेसी देख रहे है जो राहुल गांधी में नहीं है। या फिर मौजूदा वक्त में राहुल गांधी की राजनीति कांग्रेसियों को ही नहीं भा रही है। क्योंकि राहुल गांधी काग्रेस के उस ढांचे को तोड़ना चाहते हैं, जिसे इंदिरा गांधी ने बनाया। 

या कहें इंदिरा के बाद राजीव गांधी और फिर सोनिया गांधी ने जिस तरह सत्ता संभाली उसने इसके संकेत साफ दे दिये कांग्रेस संगठन से नहीं गांधी परिवार के औरे से चलती है और हर कांग्रेसी किसी भी तरह की कोई आंच गांधी परिवार पर आने नहीं देता। इसलिये जो भी हवा गांधी परिवार को लेकर बहे या बहने के संकेत दिखने लगे। बस उसी अनुरुप हर कांग्रेसी ढल जाता है। लेकिन प्रियंका के सवाल ने आने वाले वक्त के लिये यह संकेत तो दे दिये कि अगर प्रियंका जब भी मुख्यधारा की राजनीति में आयेगी वैसे ही राहुल गांधी की राजनीति पर पूर्ण विराम लग जायेगा। क्योंकि 2004 में राहुल गांधी के अमेठी से पर्चा भरने से लेकर 19 जनवरी 2013 को जयपुर में राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने तक के दौरान की परिस्थितियों को देखें तो प्रियंका हर जगह मौजूद थी। और बार बार राजनीतिक मिजाज में बात यही उभरी या हर कांग्रेसी ने यही देखा समझा कि राहुल गांधी हर महत्वपूर्ण मौके पर बिना प्रियंका गांधी के एक पग भी आगे नहीं बढ़ाते हैं। लेकिन प्रियंका को लेकर जो कांग्रेसी उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं, उनके लिये आखिरी सवाल यही है कि इंदिरा यू ही राजनीति में नहीं आ गयी।

केरल में पहली वामपंथी सत्ता डगमगायी तो उसके पीछे इंदिरा गांधी की ही सियासी चाल थी। और 42 बरस की उम्र में इंदिरा 1959 में तब कांग्रेस की अध्यक्ष बनी जब देश में समाजवादी लहर बहने लगी थी। लोहिया सीधे नोहरु को घेर रहे थे। और 1964 में नेहरु की मौत के वक्त भी कांग्रेस की अगुवाई कौन करें इसे लेकर बखूबी परिस्थितियों को देख समझ रही थी। और फिर कामराज के सिंडिकेट कांग्रेस से टकरा कर कहीं ज्यादा तेजी से उभरने का हुनर भी इंदिरा ने दिखाया था। लेकिन प्रियंका ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। और 14 अक्टूबर 2013 को जब कांग्रेस के भीतर से ही प्रियंका गांधी को लेकर खबरे निकले और 40 मिनट बाद दफन हो गयी तो आने वाले वक्त के संकेत भी दे गयी कि अब चाहे प्रियकां गांधी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को ठिकाने लगाने सामने आये लेकिन माना यही जायेगा कि राहुल हार गये । यानी जिस गांधी परिवार से देश के विकल्प की बात होती रही वही गांधी परिवार अपने ही परिवार का विक्लप बन रहा है।

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