Saturday, October 5, 2013

नवरात्र के वैज्ञानिक पहलुओं का प्रचार क्यों नहीं ?

‘नवरात्रि’ में हम ‘नव दुर्गा’ की उपासना करते हैं। नवरात्र यूं तो ‘पवित्र रात्रि’ का प्रतीक है, ऐसी रात्रि जो पाप रूपी अंधेरे का शमन कर जीवन में नई रौशनी का संचार करती है। मगर आज इन सब से इतर देश में नवरात्र के वैज्ञानिक पहलुओं को भी जानने कि जरूरत है। शत्रुओं को जीतने वाली ‘दुर्गा’ का विस्तार ‘दुर्ग’ शब्द से हुआ है। ‘दुर्ग’ अर्थात् ‘किला’ जो सुरक्षा का प्रतीक है। ऐसे में दुर्गापूजा का महत्व देश की अभेद सुरक्षा व्यवस्था के साथ भी जुड़ा है। 

नवरात्र में उपासना के द्वारा आलस्य का त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति होती है। नवरात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं।

दुर्गा के रूप में पूजी जाने वाली शक्ति स्वरूप स्त्री आज सामाज में  बेबस और लाचार नजर आती है। नारी का रूप बदला है किंतु नारी के प्रति संकीर्ण अवधारणाएं आज भी मौजूद है ऐसे में दुर्गापूजन से लोगों के अंदर एक सामाजिक परिवर्तन की उर्जा का संचार भी होता है, जो भोग बिलासीता से दुर होकर एक आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करती है। शास्त्रों में दुर्गा को सरस्वती और लक्ष्मी का रूप भी बताया गया है ऐसे में दुर्गापूजन से बौधिक विकास भी होता है जो स्वच्छ सामाज कि ओर एक नई राह दिखाती है। साथ ही शरीर में जो उर्जा का संचार होता है उससे आर्थिक विकास की ओर मनुष्य आगे बढ़ता है। नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह भी कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियाँ हैं जिनमे से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है, और ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समय में स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तनमन को निर्मल और स्वस्थ बनाये रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया नवरात्र से ये सब दूर हो जाता है।

रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। साथ ही इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंस के डॉ जी एस बर्नी का कहना है कि अभ्यास के साथ समय का भी बहुत महत्व है। अभ्यास अगर नए चंद्रमा के हिसाब से शुरू किया जाए तो शरीर ही नहीं मन भी प्रभावित होता है। जो नवरात्र के समय ही संभव है। वहीं प्रो. गेराल्ड के अनुसार भारत ही नहीं दुनिया भर में इन तारीखों में कुदरत अपने रंग बदलती है। खगोल विज्ञानियों के अनुसार नौ दिनों तक व्रत रखने वाले लोग नवरात्र के समय आइंस्टीन और न्यूटन जैसे प्रतिभा को हासील कर सकते है। क्योंकि न्यूटन और आइंस्टीन ने नवरात्र के समय प्राकृति में होने वाले परिवर्तन को बिस्तार से वर्णन किया है। साथ कई सारे प्रयोगों का निर्धारण भी किया है। जो ध्वनी तरंग और गुरुत्वाकर्षण से संबंधित है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि नवरात्र के वैज्ञानिक पहलुओं का प्रचार क्यों नहीं?

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