Thursday, November 7, 2013

देवभूमि में गरीब और दलित हिन्दुओं का धर्मान्तरण !

उत्तराखण्ड का गठन हुआ तो इस राज्य की पहचान दुनिया के नक्शे पर देवभूमि के रूप में की गई। लेकिन अब इसी देवभूमि उत्तराखंड में ईसाई धर्म के अधकचरे प्रचारकों का धर्मान्तरण-मिशन जोरों पर है। राज्य के दूर-दराज इलाकों में गरीब और दलित समुदाय के बीच प्रचारक अपनी जड़ें जमाकर व्यापक स्तर पर धर्मान्तरण में जुटे हुए हैं। उत्तराखंड के उपेक्षित, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को यह धर्म-प्रचारक ईसाई धर्म की ओर आकर्षित कर रहे हैं। उत्तराखंड में विभिन्न जनपदों के लगभग दो दर्जन से अधिक कस्बों में जाकर जुटाई गई जानकारी से यह बात और भी साबित हो जाती है कि ईसाई मिशनरियां प्रलोभन देकर तथा दूसरे धर्मों की आलोचना करके भोले-भाले और विकल्पहीन लोगों को बहका रहे हैं। ईसाई मिशनरी में प्रचारक हाल में आयी आपदा और आशाराम बापू जैसे विवादास्पद धर्म गुरुओं के नकारात्मक उदाहरणों को मुख्य हथियार बना रहे हैं। ईसाई धर्म अपनाने के लिए पादरी और धर्म प्रचारक लोगों को आर्थिक प्रलोभन देने के साथ ही बेहतर शिक्षा और मुफ्त ईलाज जैसे प्रलोभन भी दे रहे हैं। 

देवभूमि उत्तराखण्ड में नौसिखिए और अतिउत्साही धर्म प्रचारक एनकेन-प्रकारेण अपने अनुयायियों का दल-बल बढ़ाना चाहते हैं। भले ही इसके लिए उन्हें भारतीय संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ ही काम क्यों न करना पड़े। भारतीय संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म और धार्मिक मान्यताओं के प्रचार-प्रसार का पूरा अधिकार है। इसके साथ ही कोई भी भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी भी धर्म को अंगीकृत करने को स्वतंत्र है। कानून प्रदत्त इन अधिकारों के आलोक में सतही तौर पर देखने से कुछ भी गलत नहीं लगता लेकिन जायज-नाजायज तरीके से अपना कुनबा बढ़ाने में लगे हुए ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलाप का हल्का सा विश्लेषण भी अन्य धार्मिक मतावलंबियों को विचलित कर सकता है, जिससे टकराव बढऩा लाजिमी है।

हरि के द्वार पर

उत्तराखंड के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में धर्मान्तरण में जुटी ईसाई संस्थाएं बाकायदा आर्थिक प्रलोभन देकर या दूसरे धर्मों को निम्नतर साबित करके क्रिश्चियन धर्म अपनाने के लिए बरगला रही हैं। कुछ इसी तरह का संदेश देकर लोगों का धर्मांतरण करने का धंधा न सिर्फ जनपद हरिद्वार, अपितु समूचे उत्तराखंड में फल-फूल रहा है। हरिद्वार जिले में कम से कम एक दर्जन ऐसे स्थल हैं, जिनका उपयोग धर्मांतरण के लिए किया जा रहा है। कई बार हिन्दूवादी संगठनों के विरोध के कारण चर्चाओं में आये इन स्थलों की छानबीन भी की गई और धर्मान्तरण के कई मामले पकड़े भी गए, परंतु कुछ दिनों तक शान्त बैठने के बाद ईसाई मिशनरी के प्रचारक फिर सक्रिय होकर धर्म प्रचार और धर्मान्तरण में जुट जाते हैं।

विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े मुनेन्द्र शर्मा का कहना है कि देश में हर व्यक्ति को अपना अपना धर्म अपनाने व उस पर चलने की आजादी है, परंतु किसी को भी लालच देकर या फिर बहका फुसलाकर धर्मान्तरण के लिए प्रेरित करना कानून सम्मत नहीं है और ऐसा करना सामाजिक व्यवस्था के भी विरुद्ध है, इसीलिए धर्मान्तरण पर पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए। उन्हीं की जानकारी के अनुसार रुडक़ी के गणेशपुर, आदर्श नगर और रुडक़ी से सटे गांव ढन्डेरी में गरीब तबके के लोगों को थोड़े से लालच में उनका धर्म बदल देने का गोरख धन्धा ईसाई मिशनरी से जुड़े कुछ लोगों द्वारा किया जा रहा है।

इसकी पुष्टि करते हुए क्रिश्चियन सोलिडेरिटी सोसायटी (सीएसएस) के अध्यक्ष सुनील ए. ल्यूक साफ कहते हैं कि ईसाई धर्म में किसी को भी प्रलोभन देकर या दूसरे धर्मों को हीनतर साबित करके अपने धर्म में शामिल कराना सर्वथा गलत है। श्री ल्यूक कहते हैं कि कुछ ईसाई प्रचारकों की इसीलिए पिटाई होती है क्योंकि वे गलत तरीके से धर्मान्तरण करते हैं।’ सीएसएस क्रिश्चियन संस्थाओं की एक संयोजक संस्था है। सीएसएस से देहरादून की 80 ईसाई संस्थाएं संबद्धित हैं। श्री ल्यूक कहते हैं कि प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराने वाली संस्थाएं और कुछ पाने के लिए ईसाई धर्म में आने वाले लोग दोनों ही शुरुआत में ही गलत राह पकड़ लेते हैं।

इतना ही नहीं ग्राम साढोली, मखदूमपुर, कलियर समेत आधा दर्जन गांव ऐसे हैं। जहां धर्मान्तरण का गोरखधन्धा लोगों को बहला फुसला कर व प्रलोभन देकर चलाया जा रहा है। कलियर में तो हाल ही में एक युवती को बहला फुसलाकर  एक युवक मंगुपुरा ले गया और उसे धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया गया। मामला पुलिस तक पहुंचा तब जाकर युवती का धर्म और उसकी लाज बचाई जा सकी। इस तरह की घटनाएं ज्यादातर प्रकाश में नहीं आ पाती, अन्यथा बड़े स्तर पर धर्मान्तरण का कार्य उत्तराखण्ड में ईसाई मिशनरी के कुछ लोग चला रहे हैं। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी, चमोली और कुमायूं का एक महिला आश्रम धर्म परिवर्तन के केन्द्र बिन्दु बने हुए हैं। धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने और धर्म विशेष का प्रचार करने वाले ये मिशनरी लोग ज्यादातर गरीब तबके को ही अपना निशाना बनाते हैं और पिछले पांच सालों में तेजी से हजारों परिवारों का धर्म परिवर्तन हुआ है।

2008 में रुडक़ी के ग्राम साढोली में धर्म परिवर्तन के लिए लोगों को उकसाने को लेकर कई सगंठनों ने एतराज जताया था, लेकिन फिर भी इस गोरख धंधे पर लगाम नहीं लगायी जा सकी। रुडक़ी के गणेशपुर पुर्वावली में भी एक प्रार्थना घर में धर्म बदलने के लिए पे्रित करने हेतु पहले लोगों को उनके घर जाकर ईसाई धर्म का साहित्य बांटा जाता है और फिर उन्हें प्रार्थना सभा में बुलाने के बहाने धर्म परिवर्तन के लिए तैयार करने की मुहिम चलायी जा रही है। विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े मुनेन्द्र शर्मा की मानें तो उत्तराखण्ड के विभिन्न जिलों में करीब साढ़े चार हजार ईसाई प्रचारक दूसरे धर्म के लोगों का धर्मान्तरण करने के लिए तरह-तरह के अभियान चला रहे हैं।

टिहरी जिले के भिलंगना विकासखंड में सक्रिय रोमन कैथोलिक चर्च तो धर्मांतरण की हदें पार कर रहा है। भिलंगना विकासखंड के 60 गांवों में से बासर पट्टी के केपार्स गांव को ही ले लीजिए। केपार्स-वासर के लगभग 2० से अधिक लोहार परिवार ईसाई मत स्वीकार कर चुके हैं। इन परिवारों के सभी सदस्यों को छतियारा वासर के पास बालगंगा में निर्मित एक तलैया में कमर तक पानी में खड़ा करके बपतिस्मा देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित किया जा चुका है। सभी धर्मांतरित परिवारों के बच्चे शासकीय विद्यालयों के अभिलेखों में हिन्दू अनुसूचित जाति ही अंकित हैं तथा आरक्षण संबंधी सभी प्रकार के लाभ भी ले रहे हैं, जबकि वे हिन्दू रीति-रिवाज के सभी तीज-त्यौहार छोड़ चुके हैं। महिलाओं ने बिंदी तक लगानी छोड़ दी है और वे न्यू टेस्टामेंट पढ़ते हैं। क्षेत्रवासियों द्वारा इस संबंध में तहसीलदार और उपजिलाधिकारी घनसाली से शिकायत भी की गई।

लाचार लोगों को आर्थिक प्रलोभन

अपने अभियान के पहले चरण में गांव या कस्बों में पैठ बनाने के लिए कई जगह तेजतर्रार स्थानीय लोगों को पादरियों ने भवन निर्माण में सहायता करके या फिर आर्थिक मदद करके अपने साथ मिला लिया है। अब वही धर्मान्तरित लोग अपने परिचित स्थानीय  लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कुछ सहायता पाने के लालच में गरीब तबके के लोग ईसाई धर्म अपना लेते हैं कि कुछ धन या सहायता मिल जाएगी। लेकिन जब धर्मान्तरण कराकर यह लोग ईसाई बन जाते हैं और उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं भी मिला तब भी वे शर्म के कारण इसलिए वापस हिंदू धर्म में नहीं जा पाते क्योंकि तब तक या तो उनकी बिरादरी उनसे अलगाव स्थापित कर चुकी होती है। अथवा वे खुद ही बदनामी के भय से वापस नहीं जा पाते।

टिहरी गढ़वाल के नरेंद्र नगर ब्लॉक के शिवलाल का कहना है कि ईसाई मिशनरी के पादरी ने उन्हें एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की बात कही थी, लेकिन ईसाई धर्म में आने के 6 माह बाद भी उनके एक धेला तक नहीं दिया गया। शिवलाल लाचारगी भरे स्वर में कहता है कि मिशनरी वालों ने चंबा के राजेश सिंह मसीह को तो बहुत शानदार अस्पताल बनाकर दिया और वह खूब पैसे कमा रहा है, लेकिन वह अपने जैसे एक दर्जन लोगों के नाम गिनाना नहीं भूलता, जिन्हें धर्मांतरण के एवज में धन देने की बात की गई थी, लेकिन किसी को भी फूटी कौड़ी तक नहीं मिली।

रुद्रप्रयाग जिले अगस्त्यमुनि, विजयनगर और चंद्रापुरी जैसे कस्बों में भी आपदा के बाद ईसाई मिशनरियों की गश्त बढ़ गई है। मिशनरी से जुड़े लोग आपदा पीडि़तों के पास जा-जाकर उन्हें आपदा में गंवाई हुई दुकान, वर्कशॉप और तमाम मशीनों की क्षतिपूर्ति में सहायता करने का प्रलोभन दे रहे हैं। दो माह से स्थानीय लोग मिशनरियों के चक्कर काटने में लगे हुए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें फूटी कौड़ी तक नहीं मिली। एक स्थानीय व्यक्ति ने नाम न लिखने के अनुरोध के साथ बताया कि ये लोग सिर्फ उन्हीं लोगों को सहायता देंगे, जो बाद में इनके धर्म के प्रति प्रेरित होगा।

बीमारों पर चमत्कार का मरहम

आर्थिक प्रलोभनों के अलावा क्रिश्चियन मिशनरी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की आड़ में भी अपनी पैठ बना रही हैं। इसमें क्रिश्चियन मिशनरी यह प्रचार भी कर रही हैं कि प्रभु ईशु की शरण मात्र में ही उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। कई लोग मनोवैज्ञानिक रूप से इस बात से सहमत भी हो जाते हैं।

नानकमत्ता के ग्राम फिरौजा के दलवीर सिंह की बेटी के गुर्दे में पथरी थी, वह कई वर्षों से पीडि़त थी। अनेकों जगह दिखाया, इलाज करवाया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। दलवीर के पास आपरेशन के लिए पैसा नहीं था। दलवीर कहते हैं, कि मिशनरी के लोग आए, उन्होंने इलाज का भरोसा दिलाया, हम प्रार्थना सभा में गए, मेरी बेटी निर्मल कौर ने ‘पवित्र जल’ नियमित रूप से ग्रहण करना शुरू किया। कुछ दिनों में उसकी हालत में सुधार होने लगा, वह बिल्कुल स्वस्थ हो गई।

दलवीर सिंह इतना प्रभावित हुआ कि उसने मिशनरी को प्रार्थना सभा हेतु एक बीघा जमीन दे दी। जिस पर गांव व बिरादरी के लोगों ने बवाल भी किया था, लेकिन अब कुछ लोग नियमित रूप से प्रार्थना सभा में आते हैं। सत्संग करते हैं। पवित्र जल ग्रहण कराते व करते हैं। नानकमत्ता तहसील के पसैनी गांव निवासी हरदेव सिंह मिशनरी के लोगों पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि यह लोग गरीब, बीमारी से तंग, दलित समुदाय अथवा समाज के दबे कुचले उपेक्षित परिवारों से संपर्क स्थापित करते हैं तथा उन्हें इलाज, नौकरी, दवाइयां, आर्थिक सहायता आदि का प्रलोभन देते हैं।

जनपद उत्तरकाशी के विकासखण्ड मोरी के बगाण पट्टी के आराकोट के ग्राम थुनारा निवासी भजन दास का कहना है कि 2 वर्ष पूर्व उनका 5 वर्षीय पुत्र राहुल बहुत बीमार रहता था, लेकिन जब से हर रविवार आराकोट में आयोजित होने वाली प्रार्थना सभा में भाग लिया, शरीर का सारा कष्ट दूर हो गया। उत्तराखंड के विभिन्न कस्बों में अपनी पैठ बनाने के लिए मिशनरीज अपने चिकित्सालय खोल रही हैं और मुफ्त इलाज की बात कहकर स्थानीय लोगों को प्रभावित कर रही हैं।

चमोली जिले के गंगोल गांव में अमला इसाई मिशनरी ने लगभग सौ नाली जमीन खरीदी है। उसमें इन्होंने एक चर्च और अस्पताल खोल रखा है। ये जनपद के कई इलाकों मे यहीं से मिशन का प्रचार-प्रसार का काम करते हैं। यहां मिशनरी ने नेपाली मूल का इसाई अपने धर्म के प्रचार के लिए रखा था। जो धर्मांतरण के लिए गरीब परिवार वालों पर दबाव डाला करता था, परंतु स्थानीय जनप्रतिरोधों के कारण उन्हें उसको वहां से हटाना पड़ा। टिहरी गढ़वाल के चंबा और घनसाली कस्बों में खुले चिकित्सालयों में काम कर रहे मिशनरी के प्रतिनिधियों से आसपास के लोग आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

शिक्षा की आड़ में धर्मांतरण

स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के अलावा मिशनरीज शिक्षा के माध्यम से भी स्थानीय लोगों का विश्वास हासिल करते हैं। टिहरी गढ़वाल में वासर पट्टी के छोटे-बड़े 32 गांवों के एकमात्र इंटर कालेज (राजकीय इंटर कालेज नौल बासर) में अध्ययनरत धर्मांतरित अनुसूचित जाति छात्र-छात्राओं के खिलाफ स्वयं के गांव के लोगों ने विवाद खड़ा किया। विवाद खड़ा करने वालों का तर्क धर्मांतरित छात्र-छात्राओं के बारे में यह था कि उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

बासर की कक्षा 11 में अध्ययनरत एक छात्रा कु. भागीरथी को भी बपतिस्मा देकर न केवल ईसाई बनाया गया, बल्कि चर्च की परंपरा के अनुसार सफेद चोगा पहनाकर न्यू टेस्टामेंट के नियमों का वाचन कर दिल्ली के एक क्रिश्चियन मिशनरी द्वारा संचालित एक विद्यालय के वाहन चालक से उसका विवाह कर दिया गया। इसका क्षेत्रवासियों ने कड़ा विरोध किया। परिणामस्वरूप केपार्स गांव की अन्य छात्राएं इस प्रकार की शादियों की चपेट में आने से बच गई। जिनमें एक-दो का रिश्ता भी तय कराया जा चुका था।

जनपद रुद्रप्रयाग के ग्राम बड़ेथ में एक ईसाई मिशनरी सक्रिय रूप से कार्यरत है। इसका संचालन ग्राम बड़ेथ के ही बचन सिंह भण्डारी द्वारा किया जा रहा है। इस संस्था का नाम अगापे चिल्ड्रन एकेडमी है। भण्डारी ईसाई मिशनरी की तरफ से उत्तराखंड के डायरेक्टर भी हैं। वर्तमान में इनकी संस्था के माध्यम से प्रत्येक रविवार को गोष्ठी आयोजित की जाती है तथा ईसाई धर्म की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है।

सामाजिक समानता का लालच

धर्मान्तरण के लिए ईसाई मिशनरीज सामाजिक भेदभाव को भी अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। उत्तराखंड में दलित समुदाय अभी भी छुआछूत और भेदभाव का शिकार है। ग्रामीण इलाकों में दलितों की सामाजिक स्थिति बेहद चिंताजनक है। ईसाई धर्म प्रचारक इन बस्तियों में जाकर बताते हैं कि ईसाई धर्म में किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जाता। सामाजिक समानता हासिल करने के लिए अनुसूचित जाति के लोग बड़े पैमाने पर अपना धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। कलीच गांव के अव्वल का आक्रोश है कि हम देवता का सामान तो उठा सकते हैं, किंतु देवडोली को न तो छू सकते हैं और न ही पालकी में भेंट चढ़ा सकते हैं। प्रार्थना सभा में जाने से उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिला। यहां भेदभाव नहीं होता।

आजादी के 66 वर्ष बाद भी अनुसूचित जाति समुदाय के लोग सामाजिक एवं आर्थिक गुलामी का बोझ ढो रहे हैं। आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक व मानसिक रूप से पिछडऩे तथा सामाजिक प्रतिबंधों के चलते ये लोग गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। यही वजह है कि अब ये लोग अपनी सामाजिक व आर्थिक आजादी के विकल्प तलाश रही है। समाज में छुआछूत एवं भेदभाव के चलते जहां समानता का अहसास होता है, उस ओर रुख कर देते हैं। ईसाई मिशनरी इनकी आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ेपन का खूब लाभ उठा रहे हैं तथा इनके उत्थान एवं सम्मान के नाम पर धर्म परिवर्तन का पासा फेंक रहे हैं।

जनपद उत्तरकाशी के विकासखंड मोरी के अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव कलीच, थुनारा, डैलून, बागी, मोरा, देवल, खन्यासणी, भितरी के दर्जनों परिवार प्रभु ईशु पर विश्वास करते हैं तथा प्रति रविवार को होने वाली प्रार्थना सभा में भाग लेते हैं। सूत्रों के मुताबिक देहरादून के त्यूनी शहर में भी तीन स्थानों पर रविवार को प्रार्थना सभा का आयोजन होता है। जो अभी स्थान के  अभाव में विभिन्न जगहों पर कमरे में पादरी या टे्रनी द्वारा करवाई जाती है।

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