Tuesday, December 24, 2013

देवयानी की कहानी !

देवयानी खोब्रागडे के मामले में जिस तरह से हिन्दुस्तानी राजनयिक बिरादरी ने अमेरिका विरोधी ताल ठोंकी है, उससे क्या यह माना जा सकता है कि हिन्दुस्तान अमेरिकी रिश्तों का एकतरफा हनीमून खत्म हो गया है? एकतरफा हनीमून इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अमेरिकी हिंदुस्तान की ओर अपनी कनखियों से भी प्यार भरी नजर डाल देते हैं तो अब तक हिन्दुस्तानी बिछ-बिछ जाया करते हैं। अब अमेरिकी हिंदुस्तानी संप्रभुता का चीरहरण कर रहे हैं तो कुछ चीख-पुकार तो मची है, पर अमेरिकी दूतावास के वीसा डिपार्टमेंट के कड़े तेवर देख विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के तेवर तरल होने लगे हैं। 

रूस से सख्ती क्यों नहीं दिखाता अमेरिका

लेकिन देवयानी मामले की पड़ताल करने से पहले हम जरा यह समझ लें कि दो देशों के रिश्तों की बुनियाद शिष्टाचार पर निर्भर हुआ करती है। राजनय की अनिवार्यता है कि शत्रु देश के साथ भी शिष्टाचार का समुचित पालन होना चाहिए। किंतु अमेरिका अपनी विश्व चौधराहट में आवश्यकतानुकूल शिष्टाचार को परिवर्तित करता रहा है। देवयानी प्रकरण में अमेरिकी नीतियों के बारे में विश्लेषित करते समय उसे सिर्फ वियना कन्वेंशन के आधार पर कसने से सही परिदृष्टि को नहीं समझा जा सकता। अमेरिका की विदेश नीति हमेशा विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बुनियाद पर संचालित होती है। जिस देश में इन संस्थाओं को संभावनाएं नजर आती हैं उसके प्रति अमेरिकी शिष्टाचार में उदारता बरतने में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती जाती। किन्तु जिन देशों से उसे व्यापारिक लाभ, सामरिक हित या संबंधित देश की राजनयिक शक्ति का एहसास नहीं होता, उसे अमेरिकी हमेशा तुच्छ नजर से देखा करते हैं। देवयानी खोब्रागडे के साथ अमेरिकी मार्शल विभाग द्वारा की गई कार्रवाई के ठीक पहले रूसी दूतावास के खिलाफ भी मामले दर्ज हुए। चूंकि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोब हमारे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की तरह राष्ट्रहित की बजाय व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता नहीं देते इसलिए रूसी राजनयिकों के मामले में अमेरिकी अभियोजक प्रीत भरारा भी उद्दंडता दिखाने का साहस नहीं जुटा पाए। रूसी राजनयिकों में से ४९ लोगों के खिलाफ मेडिकल इंश्योरेंस में फ्रॉड का मामला अन्वेषित हुआ। इन ४९ राजनयिक कर्मियों में से ११ न्यूयॉर्क के मिशन में नियुक्त थे। जिस तरह से वीसा फ्रॉड के मामले में देवयानी खोब्रागडे के साथ बदतमीजी की गई, उन्हें हथकड़ी पहनाई गई, उनके अंतर्वस्त्रों को उतारकर उनके शरीर में मौजूद सारे केविटी (गड्ढों) को जांचा गया, उस तरह की हरकत करने की हिम्मत न प्रीत भरारा कर सके न अमेरिका का मार्शल डिपार्टमेंट।

हथकड़ी का जवाब हथकड़ी से देता रूस

कारण बहुत साफ है। अमेरिका जानता है कि यदि रूसी राजनयिकों के साथ हथकड़ी पहनाकर घुमाने की बदतमीजी की गई तो रूस के राष्ट्रपति कॉमरेड व्लादिमिर पुतिन अमेरिका के राजनयिकों को हथकड़ी ठोंकने में रंचमात्र भी संकोच नहीं करेंगे। अमेरिकी भगोड़ा स्नोडेन हिंदुस्तान की ओर आने का रुख कर रहा था तो डॉ. मनमोहन सिंह और सलमान खुर्शीद पहले ही उसके खिलाफ कार्रवाई की घुड़कियां दे रहे थे। उन्हें डर लग रहा था कि स्नोडेन यदि नई दिल्ली उतर गया तो वह अमेरिका को क्या मुंह दिखाएंगे! जबकि मॉस्को विमानतल पर स्नोडेन को व्लादिमिर पुतिन ने हरसंभव सहयोग किया वह भी विश्व चौधरी अमेरिका को आंखें दिखाते हुए। स्नोडेन के पास जो जानकारियां थीं उसमें हिंदुस्तानी सत्ता संस्थान की टेलीफोन सर्वेलेंस का भी दावा था। जर्मनी और रूस के लिए स्नोडेन की सूचनाएं जितनी महत्वपूर्ण थी उससे कम महत्वपूर्ण सूचनाएं हिंदुस्तान के संदर्भ में नहीं थीं। किंतु भारत तो अमेरिका की ओर बाअदब देखने का आदी है।

कब तक देवयानी को मिलेगा राजनयिक संरक्षण?

देवयानी खोब्रागडे के मामले में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उसने जो वीसा फ्रॉड किया है, उस अपराध से वह बच पाएगी या नहीं। अब तक जो दिखाई दे रहा है, उसके अनुसार देवयानी खोब्रागडे को तमाम राजनयिक प्रयास के बावजूद अमेरिकी कानूनों के अनुसार १५ वर्षों के कारागार की सजा सुनाई जा सकती है। यह सजा हिंदुस्तान में आम चुनावों के पहले न सुनाई जा सके इसलिए हिंदुस्तान की सरकार ने फौरी उपचार के तहत उसे संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में तैनात कर दिया है। अमेरिका हिंदुस्तान की सरकार को अधिकतम रियायत दे भी देगा तो वह फिलवक्त संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में देवयानी खोब्रागडे की नियुक्ति को अनापत्ति दे दे। जब देवयानी संयुक्त राष्ट्र के मिशन से स्थानांतरित की जाएंगी, तब क्या उन्हें राजनयिक संरक्षण हासिल होगा? क्या उन्हें न्यूयॉर्क में दर्ज वीसा फ्रॉड के मामले से मुक्त कर दिया जाएगा? अभी तक के संकेत यही बता रहे हैं कि जैसे ही देवयानी खोब्रागडे संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में नियुक्ति के चलते प्राप्त राजनयिक संरक्षण से मुक्त होंगी, उन्हें न्यूयॉर्क में दर्ज मुकद्दमे को झेलना पड़ेगा। अमेरिकी नीतिज्ञों ने देवयानी के रूप में हिंदुस्तान के कान उमेठने की एक कड़ी हासिल कर ली है।

अमेरिका को हिंदुस्तान की फिक्र नहीं

देवयानी निश्चित तौर पर हिंदुस्तान के राजनय की दृष्टि से कमजोर उम्मीदवार थीं। वास्तव में उन्हें अमेरिका में तैनात ही नहीं किया जाना चाहिए था। उनकी पृष्ठभूमि में कई बार जालसाजी के आरोप हैं। इस तरह की कच्ची कड़ी को महत्वपूर्ण मिशन में तैनात करना हिंदुस्तान की राजनय की बिरादरी को संदिग्ध साबित करने का एक अवसर है। अमेरिका ने इस अवसर को बखूबी उपयोग में लाया। न्यूयॉर्क में देवयानी के खिलाफ जिन लोगों ने मामले को आगे बढ़ाया है, संयोगवश या जानबूझकर वे दोनों अधिकारी हिंदुस्तानी मूल के हैं। प्रीत भरारा इस मामले के अभियोजक हैं जबकि निशा देसाई बिस्वाल स्टेट डिपार्टमेंट की असिस्टेंट सेक्रेटरी हैं। जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के जमाने में हिंदुस्तान के प्रति उदारता का दौर शुरू हुआ था। ओबामा जबसे सत्ता में आए हैं उनका स्वाभाविक झुकाव पाकिस्तान के प्रति है। हिंदुस्तानी राजनयिक चाहे जो दावे करते रहे हैं ‘अफ-पाक’ मामले में अमेरिका ने हमेशा हिंदुस्तान को चार हाथ दूर रहने के लिए ही बाध्य किया है। फिलहाल अमेरिका को ‘नाटो’ फौजों की सुरक्षित वापसी के लिए पाकिस्तान से दोस्ती की दरकार है। इसलिए नवाज शरीफ वॉशिंगटन यात्रा से लौटते ही कश्मीर में आखिरी सांस तक लड़ने का सुर छेड़ देते हैं। चूंकि अफगानिस्तान में हिंदुस्तान की कोई विशेष भूमिका बनती नजर नहीं आती या अमेरिका बनने नहीं देता ताकि पाकिस्तान प्रसन्न रहे इसलिए उसका हिंदुस्तानी प्यार का अगला मापदंड है व्यापारिक अनुबंध।

परमाणु समझौते का हमें क्या लाभ हुआ?

हिंदुस्थानी प्रतिरक्षा मंत्री ए.के. एंटनी को अमेरिकी विमानन कंपनियां लड़ाकू विमान बेचने के लिए एक अर्से से दबाव डाल रही थी। बराक ओबामा और डॉ. मनमोहन सिंह के बीच परमाणु समझौते के बाद भी अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदुस्तान से खासा व्यावसायिक लाभ कमाने की अपेक्षा पाल रही थीं। परमाणु समझौते को पांच वर्ष बीत चुके। किसी बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी को अब तक परमाणु समझौते का कोई लाभ नहीं मिला। ए.के. एंटनी अमेरिकी लड़ाकू विमान खरीदने से इंकार कर चुके हैं। हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था जिस दौर में पहुंची है, उसमें अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ खींचने का कोई अवसर नहीं दिखाई दे रहा। फिर अमेरिका हिंदुस्थान को क्यों झेले? अब अमेरिका की एशिया नीति में हिंदुस्तान की बजाय चीन, अफगानिस्तान और ईरान का त्रिकोण ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आ रहा है। चीन से उसे डॉलर को मजबूत रखने में मदद मिलती है। सस्ता श्रम और सस्ते उत्पाद प्राप्त होते हैं। चीन के प्रभाव से वह जापान को रोके रख सकता है। पाकिस्तान के किसी भी फैसले को बदलवा सकता है। दक्षिण कोरिया को अपने दरवाजे पर खड़ा रख सकता है। अफगानिस्तान अमेरिकी नीतियों के मध्य-पूर्व पर नियंत्रण का एक केन्द्र है। ईरान को अपना साथ देकर वह सऊदी अरब के नेतृत्ववाले मध्य एशिया की कमान पर पकड़ बनाए रखेगा। इस पूरे खेल में हिंदुस्तान कहीं मौजूद नहीं। इसलिए हिंदुस्तान की चीख-पुकार पर भले ही अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी खेद प्रकट करते हैं किन्तु देवयानी खोब्रागडे के मामले में किसी भी प्रकार की रियायत बरतने से वह साफ इंकार करते हैं।

देवयानी को आरोपी साबित करना आसान

अब हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि क्या देवयानी खोब्रागडे के मामले में हिंदुस्तान को शोर मचाना चाहिए था? २०११ में न्यूयॉर्क में नियुक्त हिंदुस्तान के उच्चायुक्त प्रभु दयाल के खिलाफ उनके घरेलू नौकर की शिकायत पर कानूनी कार्रवाई हुई थी। उस समय यह बात सुर्खियों में भी नहीं आई। मामले का निपटारा अदालत के बाहर कर लिया गया। इसी तरह न्यूयॉर्क में २०१२ में तत्कालीन सांस्कृतिक एवं प्रचार प्रतिनिधि नीना मल्होत्रा के खिलाफ भी कार्रवाई हुई थी। नीना मल्होत्रा पर उनकी घरेलू नौकरानी शांति गुरुंग ने बर्बर बर्ताव करने का आरोप लगाया था। शांति गुरुंग को अमेरिकी अदालत में नीना मल्होत्रा के खिलाफ १.५ मिलियन डॉलर की भरपाई का आदेश भी प्राप्त हुआ। तब हिंदुस्तान में इस मामले पर इतनी चर्चा क्यों नहीं हुई? शांति गुरुंग के खिलाफ भी जो कार्रवाई की गई थी, उसमें हिंदुस्तानी मूल के लूना रंजीत सक्रिय थे। लूना रंजीत न्यूयॉर्क से संचालित एनजीओ ‘अधिकार’ के सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं। ‘अधिकार’ हिंदुस्तान से आए अमेरिका में मौजूद तमाम घरेलू कर्मचारियों के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्षरत है। देवयानी खोब्रागडे मौजूदा मामले में संगीता रिचर्ड नामक हिंदुस्तानी घरेलू नौकरानी को प्रतिमाह ३० हजार रुपए के वेतन पर अमेरिका ले गई थीं। हिंदुस्तानी मानदंडों के आधार पर ३० हजार रुपए प्रतिमाह की रकम बहुत बड़ी रकम लग सकती है। परंतु अमेरिका में यह रकम सप्ताह में ४० घंटे काम करने पर प्रति घंटे लगभग ३.३१ डॉलर बैठती है। संगीता रिचर्ड के वीसा आवेदन में यह नहीं बताया गया था कि संगीता को प्रतिमाह सिर्फ ५७३.०७ डॉलर की रकम प्राप्त होगी। वहां ४५०० डॉलर प्रतिमाह उसे वेतन दिए जाने का जिक्र किया गया था। अमेरिका में प्रति घंटे घरेलू नौकरानी को दिए जानेवाले न्यूनतम वेतन का सातवां हिस्सा ही संगीता पा रही थीं। इस आधार पर तो कोई भी अमेरिकी अभियोजक संगीता रिचर्ड को देवयानी के हाथों शोषित घोषित करेगा और इसके लिए उसे १५ वर्षों के कारागार की सजा दी जा सकती है।

और भी हैं देवयानी के फर्जीवाड़े

सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस अल्तमस कबीर, जस्टिस जे.एम. पांचाल और जस्टिस सेरियक जोसेफ की खंडपीठ एक मामले में देवयानी खोब्रागडे पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप मान चुका है। यह याचिका महावीर वी. सिंघवी नामक आईएफएस अधिकारी ने दायर की थी। १९९९ के बैच के अधिकारी हुआ करती हैं देवयानी। १९९९ बैच के अधिकारियों के मामले में नियमों में बदलाव कर देवयानी को लाभ पहुंचाया गया था। इसी के चलते सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भारत सरकार पर २५ हजार रुपयों का दंड भी ठोंका था। आईएफएस अधिकारी ने देवयानी को राजनीतिक रूप से लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे सही पाया था। इस आधार पर देवयानी की अमेरिका की नियुक्ति के मामले को नकारा जाना चाहिए था। तिस पर देवयानी अमेरिका में नियुक्त होतीं उसके पहले ही मुंबई की घोटालों से खड़ी ‘आदर्श’ इमारत में उनके फ्लैट के कागजात में हेराफेरी का आरोप लगा था। ‘आदर्श’ में फ्लैट पाने के लिए देवयानी ने फर्जी हलफनामा दायर किया था। अमेरिकी अभियोजक प्रीत भरारा रहें या कोई और वैश्विक स्तर पर वह यह साबित करने में संकोच नहीं करेगा कि देवयानी खोब्रागडे फर्जीवाड़ा करने की अभ्यस्त हैं। इसलिए देवयानी को दंडित होना सहज स्वाभाविक है।

 हिंदुस्तान जो चीख-पुकार कर रहा है, उसका प्रभाव अमेरिका पर पड़नेवाला नहीं हैं। अमेरिका रूसी राजनयिकों को हथकड़ी ठोंकने से डरता है जबकि पाकिस्तान में उनका अपना अधिकारी डेविस जब पाकिस्तानियों को मार गिराता है तो उसके बदले में वह पाकिस्तान को ‘ब्लड मनी’ देकर चुप रहने के लिए बाध्य करता है। हिंदुस्तान की औकात अमेरिका की निगाह में पाकिस्तान से बड़ी नहीं है। हम संप्रभुता, अर्थव्यवस्था, विशालता के चाहे जितने दावे कर लें, अमेरिका हमें श्रेष्ठ शिष्टाचार योग्य नहीं मानता। इस सच्चाई को सलमान खुर्शीद समझते हैं इसलिए उनके तेवर तरल हो रहे हैं। देवयानी के मामले में चिल्ल-पों करके उल्टे हिंदुस्तान ने दुनिया के सामने अपनी ही कमजोरी का इजहार किया है।

No comments:

Post a Comment