Monday, December 30, 2013

आम आदमी की जीत के मायने !

मौजूदा राजनीतिक हालात में आम आदमी पार्टी का उभार एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यह सच है कि इस देश के अधिसंख्य लोग सत्ता और दल की यथास्थितिवादी, बाँझ और भ्रष्ट राजनीति से आजिज़ आ चुके हैं। इसलिए लोगों को अगर कोई विकल्प नज़र आता है, तो उसे चुनावों में वे वोट देना और जिताना पसंद करते हैं। अब तक का अनुभव यह भी रहा है कि विकल्प ज़्यादातर आभासी वर्चुअल रहे हैं और कई मामलों में वे उनसे भी बदतर साबित हुए हैं जिनके विकल्प के रूप में लोगों ने उन्हें चुना था। 

पिछले वर्षों में दो आंदोलन चले थे- एक बाबा रामदेव का आंदोलन जो विदेशों में जमा काला धन वापस लाने की बात कर रहा था और दूसरा अण्णा का आंदोलन जो सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ जन लोकपाल बनवाने के लिए अड़ा था। पहला आंदोलन पूरी तरह ख़त्म हो गया और उसके अगुआ  स्वामी रामदेव अब भाजपा द्वारा घोषित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के पैरोकार बन गये हैं। दूसरा आंदोलन (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) सिविल सोसाइटी समूहों यानी गै़र सरकारी संगठनों द्वारा खड़ा किया गया था। इनकी फंडिंग विदेशी एजेंसियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जा रही थी। आंदोलन के एक धडे़ ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में एक राजनीतिक दल की शक्ल अख़्तियार किया और आदमी पार्टी अस्तित्व में आ गयी।

हाल ही में संपन्न दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के अच्छे प्रदर्शन से उसका नेतृत्व करने वाले अत्यंत उत्साहित हैं और उन्होंने यह ऐलान कर दिया है कि अब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक झाड़ू चलेगी। कह़ने का मतलब यह है कि आने वाले लोकसभा चुनावों और उसके साथ होने वाले विधानसभा चुनावों में वे मतदाताओं के बीच जायेंगे। उन्होंने समाज के हर वर्ग के ‘अच्छे लोगों’ से अपील की है कि वे ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) में शामिल हों और यहाँ तक कि उन्होंने उद्योग यानी कॉरपोरेट जगत् के लोगों को भी पार्टी में आने का न्यौता दिया है। समाजकर्म, आंदोलन, एनजीओ, राजनीतिक दल, कॉरपोरेट समूह या किसी पेशे से जुड़े अच्छे और ईमानदार ‘आम आदमियों’ के लिए ‘आप’ के दरवाजे खुले हैं।

स्वराज और सुशासन दो अलग-अलग चीजें हैं। स्वराज के लिए बुनियादी शर्त है कि मौजूदा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हो। पूर्ण स्वराज का जो संकल्प 26 जनवरी, 1930 को रावी नदी के तट पर हमारे पुरखे स्वाधीनता सेनानियों ने तत्कालीन काँग्रेस के बैनर तले पारित किया था वह आज भी प्रासंगिक है। उस समय वे ब्रितानी साम्राज्य द्वारा प्रवर्तित उपनिवेशवाद के खि़लाफ़ लड़ रहे थे और आज हमारे सामने चुनौती है कॉरपोरेट-नीत भूमण्डलीकरण की। भूमण्डलीकरण की ताक़तें सुशासन का नारा ज़ोर-शोर से लगा रही हैं। 

सुशासन यानी गुड गवर्नेंस पर तो सबसे ज़्यादा ज़ोर विश्व बैंक ही दे रहा है। वह यह चाहता है कि भूमण्डलीकरण का अश्वमेध यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो। हाँ! भूमण्डलीकृत व्यवस्था के अन्तर्गत हर देश में ऐसे लोग सत्तारूढ़ हों जो लोगों को तथाकथित सुशासन दे सकें! शासन-व्यवस्था बेहतर ढंग से चले, इसका आशय यह है कि विदेशी पूँजी निवेश के लिए अच्छा माहौल बने, कॉरपोरेट-संचालित विकास के मॉडल का रोड रोलर लोगों को रौंदता हुआ निर्बाध चलता रहे, निवेशकों के लिए कारगर एकल खिड़की निस्तारण व्यवस्था हो जो पारदर्शी रूप में तेज़ी के साथ चले और जिसमें बंदिशों के लिए कोई गुंजाइश न हो यानी कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सब तरफ़ से पूरी तरह खुला हो। हाँ! गरीबों, कमज़ोर तबके के लोगों और वंचित जनों के लिए थोड़ी-बहुत राहत का काम मुस्तैदी के साथ चलाया जाय जिससे भूमण्डलीकरण का चेहरा मानवीय दिखे। जिन देशों में हर संभव कोशिश के बाद भूमण्डलीकरण की ताक़तें ऐसा सुशासन नहीं ला पातीं उन्हें ‘विफल राज्य’ या ‘दुष्ट राज्य’ घोषित कर दिया जाता है और वहाँ हुकूमत-बदली या तख़्ता पलट की कार्यवाहियाँ की जाती हैं। इसलिए तथाकथित सुशासन यथास्थितिवाद से टक्कर नहीं ले पाता।

आम आदमी पार्टी के एजेंडे में स्वराज्य की स्थापना का संकल्प या सपना बिल्कुल भी नहीं है। हाँ! उसमें स्वराज्य लाने का स्वाँग भर ज़रूर दिख रहा है। दरअसल उसका सारा ज़ोर सुशासन लाने पर ही है। इधर भूमंडलीकरण की ताक़तों का मोहभंग राजनीतिक दलों और उनके द्वारा नियंत्रित या संचालित सरकारी ढाँचों से होता गया है। उन्होंने अब दलतंत्र के स्थान पर सिविल सोसाइटी को तरजीह देना शुरू कर दिया है।

उनकी कोशिश है कि सिविल सोसाइटी समूह यानी गै़र सरकारी संगठन राजनीतिक पटल या स्पेस में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करें। ऐसा चलन आम हो गया है कि भूमण्डलीकरण के दबाव में सरकारें सिविल सोसाइटी समूहों को अपनी सलाहकार परिषदों में मनोनीत करने पर मज़बूर हो गयी हैं जिससे राहत के कार्यक्रमों का स्वाँग भलीभाँति किया जा सके यानी अनर्थकारी नीतियाँ लागू होती रहें लेकिन मानवीय चेहरे के साथ। ‘विष रस भरा कनक घट जैसे’ वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है।

देश की संसद में जाने के लिए कटिबद्ध आम आदमी पार्टी का रुख़ किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर एकदम साफ़ नहीं है। भूमि अधिग्रहण, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, कॉरपोरेट समूह/घराने, एफडीआई/एफआई आई, खनन, नाभिकीय संयंत्र, मेगा औद्योगिक या व्यावसायिक व इन्फ्रास्ट्रक्चरल परियोजनाएँ, जनविरोधी आर्थिक नीतियाँ, किसानो व बुनकरों की आत्महत्या, रोज़गार सृजन जैसे अहम सवालों पर मुखर रूप में यानी स्पष्ट तौर पर आम आदमी पार्टी कुछ भी कहने से परहेज़ करती है। इन बुनियादी बिंदुओं को केंद्र में रखकर जगह-जगह तृणमूल स्तर पर जो जन आंदोलन चल रहे हैं, उनके साथ ‘आप’ की पक्षधरता संदिग्ध है। हाँ! उन आंदोलनों से जुड़े समाजकर्मियों को सत्ता की लालच दिखाकर उन्हें अपनी ओर मोड़ने की कोशिश ज़रुर जारी है।

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में ‘आप’ विकल्प बिल्कुल नहीं है। हाँ! अभी वह कमतर बुराई ज़रूर है। यह बात ध्यान में रखने की है कि बुराई की प्रवृत्ति हमेशा अधिकतम की ओर उन्मुख होने की दिशा में होती है। ठंडा लोहा पीटने से विकल्प नहीं तैयार होगा। वह खड़ा होगा स्वतः स्फूर्त जन आंदोलनों के ताप से। आंदोलनों के सामने चुनौती है कि वे कैसे धारा के विपरीत खड़े होकर राजनीतिक विकल्प निर्माण की दिशा में संघर्षरत रह सकते हैं। आंदोलनों के ताप से ही विकल्प गढ़ा जा सकता है। विकल्प का मूल आधार लोकशक्ति होगा। नया नेतृत्व भी आंदोलनों के जरिये तैयार होगा।

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